के साथ कलरीपायपट्टु को दुनिया की सबसे पुरानी मार्शल आर्ट तकनीक माना जाता है।

इस कला की उत्पत्ति दक्षिण भारत के केरल राज्य में हुई। कलरीपायपट्टु दो शब्दों से मिल कर बना है, पहला 'कलरी' जिसका मतलब स्कूल या व्यायामशाला जबकि दूसरे शब्द 'पायट्टु' का मतलब होता है युद्ध या व्यायाम करना। ऐसी मान्यता है कि कलरीपायपट्टु को स्वयं भगवान शिव ने बनाया और इस कला का ज्ञान उन्होंने सप्तऋषि अगस्त्य को दिया जिन्होंने इस कला की मदद से दक्षिणी कलरीपायपट्टु का विकास किया। इसी विद्या को आज के युग में मार्शल आर्ट के नाम से जाना जाता है।

ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार कलरीपायपट्टु नामक इस विद्या को भगवान परशुराम एवं सप्तऋषि अगस्त्य ही देश के दक्षिणी भाग में लेकर आए थे। कहते हैं कि भगवान परशुराम शस्त्र विद्या में महारथी थे इसलिए उन्होंने उत्तरी कलरीपायपट्टु या वदक्कन कलरी विकसित किया।जूडो, कराटे और कुंगफू, ताइक्वोंडो और अन्य मार्शल आर्ट कलरीपायपट्टु के आगे सब फेल माने जाते हैं। इस बात की हैरानी होती है कि चीन ने भारत से कलरीपायपट्टु के मूव चुराए हैं।

यह बात भी हैरान करने वाली है कि कितने पुराने समय में विकसित की गई यह विद्या आज भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में अलग रूप में मार्शल आर्ट के नाम से जानी जाती है। माना जाता है कि यह भी एक भारतीय की ही देन है। बोधिधर्मन दक्षिण भारतीय तमिल राजवंश पल्लव वंश के राजकुमार थे लेकिन वह अपने जीवन में कुछ अलग करना चाहते थे। शायद इसलिए उन्होंने कलरीपायपट्टु की विद्या प्राप्त की। उन्होंने ही शाओलिन की स्थापना की। बाद में पता चला कि बोधिधर्मन एक आयुर्वेदाचार्य भी थे। यहां तक चाय की खोज भी उन्होंने ही की थी।

कलरीपायपट्टु के साथ-साथ बोधिधर्मन सम्मोहन में भी महारथी थे। चीन में उनके कुछ शिष्यों ने उन्हें जहर दे दिया। वह यह बात जानते थे कि उनके शिष्य उन्हें जहर दे रहे हैं फिर भी उन्होंने उसे ले लिया। इसके उपरांत चीन के लोगों ने कलरीपायपट्टु को मार्शल आर्ट का नाम दे दिया।