युग के आदि में मनुष्य भी जंगली था। जब से मनुष्य ने विकास करना शुरू किया, उसकी आवश्यकताएं बढ़ गई। आवश्यकताओं की पूर्ति न होने से समस्या ने जन्म लिया। समस्या सामने आई तब समाधान की बात सोची गई। समाधान के स्तर दो थे- पदार्थ-जगत, मनो-जगत. प्रथम स्तर पर पदाथरे के सुनियोजित उत्पादन और उनकी व्यवस्था को आकार मिला। दूसरा स्तर मानसिक था। इस जगत की समस्याएं थी अपरिमार्जित वृत्तियां, असंतुलन और तनाव। 
इन समस्याओं को समाहित करने के लिए धर्म की खोज हुई। धर्म का अर्थ है पारंपरिक मूल्य-मानकों से परे हटकर मनुष्य को सत्य की दिशा में अग्रसर करना। जब तक धर्म अपने इस परिवेश में रहता है, तब तक वह रूढ़ नहीं हो सकता। पर उद्देश्य की विस्मृति के साथ ही उसमें रूढ़ता आ जाती ह। रूढ़ धर्म को व्यक्ति अपने जीवंत संदभरे से काटकर परलोक के साथ जोड़ देता है। बस यहीं से धर्म में विकृति का प्रवेश होने लगता है। मैं ऐसा सोचता हूं कि धर्म का संबंध हमारी हर सांस से होना चाहिए। ऐसा वे ही व्यक्ति कर सकते हैं जो अपने जीवन की सतह पर दौड़-धूप कर रहे हैं। या फिर यह उन लोगों का काम है जो जीवन की गहराइयों में उतरकर अध्यात्म के प्रति समर्पित हो जाते हैं। 
जीवन की सतह पर जीने वाले व्यक्ति धर्म की गहराई में नहीं उतर सकते, किंतु अध्यात्म के प्रयोक्ता की दृष्टि से वह गहराई छिपी नहीं रह सकती। जो व्यक्ति उतनी गहराई में उतरे, उन्हें धर्म की विकृतियों का बोध हुआ। जो धर्म मन को समाधान देने वाला था, वह स्वयं समस्या बनकर उभर गया। इस दृष्टि से उसमें संशोधन व परिवर्तन की अपेक्षा अनुभव हुई। अणुव्रत उसी आवश्यकता का आविष्कार है। यदि धर्म एक समस्या बनकर सामने नहीं आता तो उसे अणुव्रत के रूप में प्रस्तुति देने का कोई अर्थ ही नहीं था। अणुव्रत धर्म के साथ विवेक की अपरिहार्यता पर बल देता है। आगम की भाषा में विवेक ही धर्म है।