धर्म के मुख्यत:  दो आयाम हैं। एक है संस्कृति, जिसका संबंध बाहर से है। दूसरा है अध्यात्म, जिसका संबंध भीतर से है। धर्म का तत्व भीतर है, मत बाहर है। तत्व और मत दोनों का जोड़ धर्म है। तत्व के आधार पर मत का निर्धारण हो, तो धर्म की सही दिशा होती है। मत के आधार पर तत्व का निर्धारण हो, तो बात कुरूप हो जाती है।  
एक संत आता है। भीतर की गुफा में जाकर धर्म के तत्व अध्यात्म को जानता है। फिर वह चला जाता है। फिर मत बचा रहता है। उसके आधार पर एक संस्कृति विकसित होती है। संस्कृति के फूल खिलते हैं। काल प्रम में संस्कृति मुख्य हो जाती है। अध्यात्म गौण हो जाता है। और फिर एक संत को, एक जीवित संत को इस धरती पर आना पड़ता है। फिर से अंगारे जलाने होते हैं। फिर से दीप जलाना होता है।   
जो दीप कभी जला था, उसके आधार पर जो गीत रह गए थे, वे पुराने पड़ जाते हैं। फिर से एक नया दीपक जलता है। नई रोशनी आती है। नया गीत फूटता है। नई नदी बहती है। सब कुछ नूतन हो जाता है। तो कहूँगा कि तुम जानो या न जानो, तुम सब धर्म के मार्ग पर ही हो। कोई व्यक्ति ऐसा नहीं हैं, जो धर्म के मार्ग पर नहीं है।   
यह और बात है कि उसे पता है, या नहीं पता है। लेकिन धर्म का तत्व क्या है? धर्म का उद्गम क्या है? कहाँ पहुँचना है हमें? गंतव्य कहाँ है?   
उस बात को बताने के लिए ही संत इस धरती पर आता है। स्वामी विवेकानंद जी भी आए। और ये याद दिलाने के लिए आता है संत कि तुम कौन हो? 'अमृतस्य पुत्रा?।' तुम राम-कृष्ण की संतान हो। तुम कबीर और गुरुनानक की संतान हो। तुम बुद्ध और महावीर की संतान हो। तुम क्यों दीन-हीन और दरिद्र जैसा जीवन जी रहे हो? क्यों अशांत हो, क्यों दु:खी हो? अपना स्वरूप हम भूल गए हैं। करीब-करीब ऐसे ही हम जीवन जीते हैं अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर।   
इस जीवन की कितनी गरिमा है। इस जीवन की कितनी क्षमता है। अनंत आनन्द का खजाना, जो हमारे भीतर है, उसकी ओर हम पीठ करके जीते हैं। महर्षि नारद की तरह फिर कोई संत आता है हमारे बीच। कभी बुद्ध, कभी महावीर, कभी कृष्ण, कभी राम, कभी गुरुनानक, कभी गुरु अर्जुनदेव, कभी दादू, कभी दरिया, कभी रैदास, कभी मीरा, कभी सहजो, कभी दया बनकर आता है और हमसे कहता हैं कि चलो! उस मानसरोवर को चलो, जहाँ से तुम आए हो।