गांधी जी ने अपने जीवन में अहिंसा के विविध प्रयोग किए। वे एक वैज्ञानिक थे। उनका जीवन प्रयोगशाला था। उनका प्रारंभिक और अंतिम साहित्य देखने से यह तथ्य भलीभांति स्पष्ट हो जाता है। बड़े जीव की सुरक्षा के लिए छोटे जीव को मारने में वे पाप बताते थे। खती को हानि पहुंचाने वाले बंदर, हिरण तथा अन्य जहरीले जानवरों को मारने में भी वे पाप मानते थे। यद्यपि आवश्यकतावश उन्होंने जीवों को मारने की इजाजत भी दी, पर उसे शुद्ध अहिंसा कभी नहीं माना। मेरे सामने भी ऐसे प्रश्न आते हैं कि बिल्ली चूहे को मारती है तो उसे बचाना अहिंसा है या नहीं? मैं कहता हूं कि बचाना या बिल्ली को भगाना आपका काम है। मैं इसमें हस्तक्षेप नहीं करता, किंतु इसे शुद्ध अहिंसा नहीं माना जा सकता। शुद्ध अहिंसा वही है जहां हिंसक का दिल बदले। बिल्ली से आप चूहे को बचा सकेंगे, किंतु उसे अहिंसक नहीं बना सकते।   
बूचड़खाने में पैसा देकर आप जानवरों को बचा सकते हैं, किंतु ऐसा करके आप कसाई को अहिंसक नहीं बना सकते। मैं किसी को बचाने में अवरोधक नहीं बनता। किंतु मेरा वास यह है कि अहिंसा और धर्म को पैसों से खरीदा नहीं जा सकता। डंडे के बल से भी अहिंसा नहीं हो सकती। वह तो किसी के दिल को बदलने से ही हो सकती है। आज धार्मिकों की स्थिति बड़ी दयनीय है। उन्हें देखकर दिल में दर्द होता है। जैसे-तैसे शोषण से पैसे का अर्जन करते हैं, फिर उससे किसी मंदिर का फर्श और धर्मशाला बनाकर या सदाव्रत खोलकर मन से सोचते हैं कि हमने धर्म किया है। यह कैसी विडंबना है?   
धर्म नहीं कहता कि आप पाप से पैसा कमाएं। ऐसे धार्मिक लोग हथियार नहीं रखते, किंतु कलम से न जाने कितनों के गले काट लेते हैं। कोई किसान सेठ के पास बैठा था। सेठ के कान से कलम गिर पड़ी। किसान बोला- आपकी छुरी गिर गई है। सेठ झुंझलाकर बोला- कैसी बात कर रहे हो, हम तो धार्मिक आदमी हैं, फिर छुरी कैसे रख सकते हैं? किसान ने कलम हाथ में लेकर पूछा- यह क्या है?