पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार श्राद्ध पर्व सितम्बर महीने में अश्विन मास (क्वॉर) के कृष्ण पक्ष से प्रारंभ होते है, हिन्दु मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध पर्व में पितरों का तर्पण किया जाता है, श्राद्ध पक्ष में पुरखों को बैठाया जाता है, तथा पन्द्रह दिन तक उनका शोडषपचार पूजन व उनका भोग निकाला जाता है, श्राद्ध पक्ष को करे दिन के नाम से भी जाना जाता है, इन श्राद्धों में कोई विशेष पुनीत कार्य तथा धर्म से सम्बन्धित पूजा अर्चना नहीं की जाती श्राद्ध पक्ष में पुरखों के लिए पिण्ड दान करना बहुत ही श्रेष्कर माना जाता है, पन्द्रह दिनो के बाद अमावस्या आती है, जिसे सर्वपिर्त मोक्ष अमावस्या कहा जाता है, इस दिन पितरों का विसर्जन किया जाता है, श्राद्ध पर्व सिर्फ पूर्वजो की आत्मिक शांति के लिए किया जाता है, क्योंकि श्राद्ध पर्व के पन्द्रह दिन सर्व श्रे… माने गए है, जिस तिथि पर पुण्य तिथि पडती है, उस तिथि पर श्राद्ध करना चाहिए।     
त्रिविधंश्राद्धमुच्यते के अनुसार मत्स्य पुराण में तीन प्रकार के श्राद्ध बतलाए गए है, जिन्हें नित्य श्राद्ध, नैमित्तिक एवं काम्य श्राद्ध कें नाम से जाना जाता है। यमस्मृति में पांच प्रकार के श्राद्धों का वर्णन मिलता है। जिन्हें नित्य श्राद्ध, नैमित्तिक काम्य श्राद्ध, वृद्धि और पार्वण श्राद्ध के नाम से जाना जाता है। 
नित्य श्राद्ध :-  
नित्य का अर्थ है, प्रतिदिन अर्थात् रोज-रोज किए जाने वाले श्राद्ध को नित्य  श्राद्ध कहते है, इस श्राद्ध में विश्व देव को स्थापित नहीं किया जाता अत्यंत आवश्यकता एवं असमर्थ अवस्था में केवल जल से ही इस श्राद्ध को सम्पन्न किया जा सकता है। 
नैमित्तिक श्राद्ध :- 
इस श्राद्ध में किसी को निमित्त बनाकर जो श्राद्ध किया जाता है, उसे नैमित्तिक श्राद्ध कहते है, इसे एकोदिष्ट के नाम से भी जाना जाता है, एकोदिष्ट का मतलब है, किसी एक को निमित्त मानकर किया जाने वाला श्राद्ध जैसे- किसी की मृत्यु हो जाने पर दशाह, एकादशाह आदि एकोदिष्ट श्राद्ध के अन्तर्गत आता है, इसमे भी विश्वदेवों को स्थापित नहीं किया जाता। 
काम्य श्राद्ध :-  
किसी कामना की पूर्ति के निमित्त जो श्राद्ध किया जाता है, वह काम्य श्राद्ध के अन्तर्गत आता है। 
वृद्धि श्राद्ध :-  
किसी प्रकार की वृद्धि में जैसे- पुत्र जन्म, विवाह आदि मांगलिक कार्यो में जो श्राद्ध होता है, उसे वृद्धि श्राद्ध कहते है, इसे नान्दी श्राद्ध व नान्दीमुख श्राद्ध के नाम से भी जाना जाता है। 
पार्वण श्राद्ध :-  
पार्वण श्राद्ध पर्व से सम्बन्धित होता है, किसी पर्व जैसे पितृपक्ष, अमावस्या अथवा पर्व की तिथि आदि पर किया जाने वाला श्राद्ध पार्वण श्राद्ध कहलाता है। यह श्राद्ध विश्वदेव सहित होता है। 
विश्वामित्र स्मृति कथा भविष्यपुराण में बारह प्रकार के श्राद्धों का वर्णन मिलता है, जिन्हें नित्य, नैमित्तिक काम्य, वृद्धि, पार्वण, सपिण्डन,गोष्ठी , शुद्धयर्थ, कर्माग, दैविक, यात्रार्थ तथा पुष्ट्यर्थ के नामों से जाना जाता है, यदि ध्यान पूर्वक देखा जाए तो इन बारहों श्राद्धों का स्वरूप ऊपर बताए गए पांच प्रकार के श्राद्धों में स्पष्ट रूप से झलकता है। 
सपिण्डनश्राद्ध :- 
संपिण्डन शब्द का अभिप्राय पिण्डों को मिलाना दरअसल शाŒााsं के अनुसार जब जीव की मृत्यु होती है, तो वह प्रेत हो जाता है, प्रेत से पितर में ले जाने की प्रप्रिया ही सपिण्डन है, अर्थात् इस प्रप्रिया में प्रेत पिण्ड का पितृ पिण्डों में सम्मेलन कराया जा सकता है, इसे ही सपिण्डन श्राद्ध कहते हैं। 
गोष्ठी  श्राद्ध :- 
गोष्ठी  शब्द का अर्थ समूह होता है, जो श्राद्ध सामूहिक रूप से या समूह में सम्पन्न किए जाते है, उसे गोष्ठी श्राद्ध कहते हैं। 
शुद्धयर्थ श्राद्ध :- 
शुद्धि के निमित्त जो श्राद्ध किए जाते है, उसे शुद्धयर्थ श्राद्ध कहते है, जैसे शुद्धि हेतु ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए। 
कर्माग श्राद्ध :- 
कर्माग का सीधा साधा अर्थ कर्म का अंग होता है, अर्थात् किसी प्रधान कर्म के अंग के रूप में जो श्राद्ध सम्पन्न किए जाते है, उसे कर्माग श्राद्ध कहते है, जैसे- सीमन्तोन्नयन, पुंसवन आदि संस्कारों के सम्पन्नता हेतु किया जाने वाला श्राद्ध इस श्राद्ध के अन्तर्गत आता है। 
यात्रार्थ  श्राद्ध :- 
यात्रा के उद्वेश्य से किया जाने वाला श्राद्ध यात्रार्थ श्राद्ध कहलाता है, जैसे- तीर्थ में जाने के उद्वेश्य से या देशान्तर जाने के उद्वेश्य से जिस श्राद्ध को सम्पन्न कराना चाहिए वह यात्रार्थ श्राद्ध ही है, यह घी द्वारा सम्पन्न होता है, इसीलिए इसे घृत श्राद्ध की भी उपमा दी गयी है। 
पुष्ट्यर्थ श्राद्ध :- 
पुष्टि के निमित्त जो श्राद्ध सम्पन्न हो, जैसे शारीरिक एवं आर्थिक उन्नति के लिए किया जाने वाला श्राद्ध पुष्ट्यर्थ श्राद्ध कहलाता है। 
वर्णित सभी प्रकार के श्राद्धों को दो भेदों के रूप में जाना जाता है, श्रौत तथा स्मार्त्त पिण्डपितृयाग को श्रौत श्राद्ध कहते है, तथा एकोदिष्ट पार्वण आदि मरण तक के श्राद्ध को स्मार्त्त श्राद्ध कहा जाता है।