श्राद्ध क्यों : सनातन हिन्दू धर्मावलम्बियों ने पूर्व पुरूषों के प्रति आभार, आदर और श्रद्धा व्यक्त करने के लिए अपने धर्म शास्त्रों के निर्देशानुसार जिस विधि को अपनाया है। उसका नाम है श्राद्ध। श्राद्ध शब्द की उत्पत्ति श्रद्धा से हुई है। पुलस्त्य स्मृति वायु पुराण श्राद्ध तत्व आदि ग्रंथों में इस कर्म को इन शब्दों में परिभाषित किया है।  
    श्लोक : श्रद्धया प्रियते यस्याच्छाद्धं तेज प्रकीतित:।  
अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञ भाव से की जाने वाली यह प्रिया जब लोगों के प्रवाद और अज्ञानवश तथा पापा चाहं की अभिवृद्धि के कारण शनै:-शनै: लुप्त हो रही है और हिन्दू समाज गीता में अर्जुन की आशांकानुरूप लिखा ‘लुप्त पिण्डोदक प्रिया’ की स्थित है और प्रयासरत है। श्राद्ध प्रिया कि क्षीण होने के कारण कर्मकाण्डी विद्वानों का अभाव भी एक महत्वपूर्ण कारण है। आधुनकि परिवेश में जीविका के लिए व्स्त दिनचर्या के साथ जीने वाले निरीह गिरीह मानव को श्राद्ध कर्म की घंओ लबी प्रियाओं का निवाहना संभव नहीं है। दूसरी ओर कर्मकाण्डी विद्वानों की संख्या दिनों दिन कम होती जा रही है। अत: सनातन हिन्दू धर्म की इस पवित्र परिपाटी को जीवित रखने के प्रयास होने चाहिए। श्राद्ध कर्म में श्राद्ध (श्रद्धा ही प्रमुख है) इस बात को श्राद्ध कर्ता अपने मन में भली प्रकार बैठाकर ही श्रद्धापूर्वक पितरों का श्राद्ध करें तो उसका अंश भाग हमारे पितर प्रसन्नता पूर्वक ग्रहण करते हैं और अपने वंशजों की सुख समृद्धि को आशीर्वाद प्रदान करते हैं। अनेक गृथों में यह बात अति विश्वासपूर्वक कही गई है।  
    श्लोक :    आयु: पूजां धनं विद्यां मोक्षं सुखानि च। 
        प्रयच्छन्ति तथा राज्यं प्रीतानणां पितामह:।।  
अर्थात श्राद्धकर्ता की धन राज्य ज्ञान स्वर्ग मोक्ष जाति स्मारिता (स्मरण) आदि सब प्राप्त हो जाते हैं। वायु पुराण में कहा गया है - 
    श्लोक :    पूजा पुष्टि: स्मृति मेघा राज्य मारोग्य एवंच। 
        पितृणां हि प्रसादेन प्राप्यते सुमहात्मनाम।। वायु 73/71 
वंश की सुख समृद्धि के लिए भी श्राद्ध किया अत्यन्त आवश्यक कर्म है। ‘बाढ़हि पूत पिता के धर्मा’ इस कहावत के अनुसार पितृ ऋण से मुक्ति का भी एकमेव साधन श्राद्ध कर्म है। फिर हमारी संतान भी तो थोड़ा बहत हमारा ही अनुकरण करेगी। अत: श्राद्धकर्म से विरति रहने वाले हिन्दू संस्कारों की जड़ें तो काटते ही हैं। वे अपने वंश के लिए विपत्तियां ही मोल लेते हैं। श्राद्ध कल्पलता, श्राद्ध चन्द्रिका मार्पण्डेय पुराण आदि ग्रन्थों में इस संबंध में स्पष्ट चेतावनी दी गई है।  
    श्लोक : न तत्र वीरा जायन्ते आरोग्यं न शतायुष:। 
        न च श्रेयाधिमच्छन्ति पत्र श्राद्धं विवजितं।। 
अर्थात जिस गृह में जहां श्राद्ध नहीं होता, वहां दु:ख क्लेश रोग आदि होते हैं और वायु का नाश होता है और श्रेय प्राप्त नहीं होता। पितृगण देवताओं से भी अधिक कृपालू होते हैं और वंशजों की श्रद्धा से प्रसन्न होते हैं। मृतात्मा की वार्षिक तिथि पर एकोदिष्ट तथा महालय एवं पर्व पर ‘‘पार्वण’’ विधि करना चाहिये। यदि इतना करना संभव न हो तो संकल्पित श्राद्ध तथा तर्पण अवश्यक करना चाहिए।  
    आचमन प्रणायामादि : कुशासन (आसन) पर पूर्व दिशा की ओर मुंह करके बैठें। हाथ की अनामिका अंगुली में ती कक्षाओं से बनी हुई तथा दाहिने हाथ की अंगुली में दो कुशाओं से बनी हुई पवित्री (कुशा की बनायी हुई एक प्रकार की अंगूठी) धारण कर श्राद्धकर्ता आचमन व प्राणायाम करके तीन कुशाओं को सीधी बैठकर गांठ लगा दें और उसके अग्र भाग को पूर्व दिशा की ओर करके भूमि पर रख दें। तत्पश्चात श्राद्ध के निमिक्त बनाये पकवान और सामग्री को नीचे लिखं मंत्र से पवित्र करें।  
    ओम् अपवित्र: पवित्रो वा सर्वास्था गतो अपिवा। 
    या स्मेरत्पुन्डरी काक्षं स वाहयाभ्यान्तर: शुचि:।। 
इसके बाद बायें हाथ में पीली सरसों को दाहिने हाथ से चारों दिशाओं तथा भूमि व आकाश में निम्नांकित मंत्र पढ़ते हुए फेंक दें। ओम् प्राच्ये नम: (पूर्व में)। ओम् अवाच्यै नम: (दक्षिण में) ओम् प्रतीच्याद्धे नम: (पश्चिम में), ओम् प्रदीच्याये नम: (उत्तर में) ओम् अन्तरिक्षाय नम: (ऊपर) ओम् भूम्यै नम: (नीचे), इसके बाद जवा तिल एवं पुष्पों से तीन बार भूम्यै नम: बोलते हुए पृथ्वी का पूजन करें। पुन: गायत्री मंत्र तथा निम्नांकित मंत्र का तीन बार जाप करें।  
    ओम् देव लभ्य: पितृ भ्रयश्च महायोगिभ्यज एव च। 
    नम: स्वाधायै स्वाहार्य नित्य मेव नमो नम:।। 
मंत्र जाप के बाद श्राद्ध का प्रतिज्ञा संकल्प करें। संकल्प:- हमारे धार्मिक कार्यों में संकल्प का बडत्रा महत्व है। यह एक प्रकार की प्रतिज्ञा है। जिसे कर्ता अपने वंश, गोत्र व नाम आदि के उच्चारण के साथ एक निश्चित तिथि व समय पर करने की घोषणा करता है। श्राद्ध के लिये संकल्प का उच्चारण इस प्रकार करें। ओम् अध विप्रम संवत सरे (अमुक) संपख्यके, अमुक मासे अमुक पक्षे अमुक तिथां अमुक वासरे अमुक गोत्रस्य अस्मत पितृ: सांकल्पिक श्राद्ध तदमत्वे न बलि बैश्य खोख्ये पवादि कर्म च करिश्यते।  
श्राद्ध के दिन किसी प्रकार का रोग दोष प्रोध असत्य भाषण या उद्दंता का आचरण न करे। मनृस्मुति में लिखा है। 
श्लोक : अश्रून गमयति प्रेतान, कोपोडरीननृतं शुन:। 
पादस्पर्शस्तु रक्षांसि, दुष्कृतीत वधून नम:।। 
वृहद पारासर स्मृति में श्राद्ध कर्म में उपयुक्त न होने वाले पुष्पों के नाम बताये गये है। विल्व पत्र, मालती चंपा, नागकेशर, जबा कनेट कचनार, केतकी और समस्त रक्त पुष्पों को श्राद्ध पूजन में कदापि नहीं लेना चाहिए अन्यथा उस पूजन को राक्षस गृहण कर लेते है। श्राद्ध के समय पकवान आदि लोहे के पात्र में न रखें, तथा लोहे के पात्रों को किसी काम में न लेवे। श्राद्ध भोजन के निमिक्त ब्राम्हण को निमंत्रित करते समय भी कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए। मतृ स्मृति में लिखा है की लंगड़ा, काना, दाता का दास, अंगहीन और अधिक अंगवाला ब्राम्हण भी श्राद्ध भोज के लिए उपयुक्त नहीं है। इसके लिए उपयुक्त ब्राम्हणों को एक दिन पूर्व ही निमंत्रित कर देना चाहिए। श्राद्ध के दिन प्रात: प्रसन्न मन से अपने पितरों माता-पिता का श्रद्धा पूर्वक स्मरण करते हुए नदी अथवा पुंए के जल में स्नान करके उत्साह पूर्वक श्राद्ध किया उत्साह पूर्वक करना चाहिए।