सत्य का शब्दों मे वर्णन नहीं किया जा सकता। सत्य चित्त के अन्वेषण और अनुभूति का विषय है। सत्य को परमेश्वर कहा है। सत्य ही भगवान है। हम सत्य का अनुभव कर सकते हैं, उसका साक्षात्कार नहीं कर सकते हैं। सत्य को उपलब्ध किया जा सकता है, किन्तु उसका वर्णन नहीं कर सकते। सत्य अकथ्य है, अलभ्य नहीं। अकथ्य है, किन्तु संवेदनगम्य है। सत्य की उपलब्धि ही परमात्मा की उपलब्धि है। सत्य की प्राप्ति के लिए हमें कहीं बाहर भटकने की जरूरत नहीं है। सत्य हमारे भीतर है। एक बार झाँककर देखने की कोशिश करें, तो सत्य उपलब्ध हो जायेगा।
महात्मा गाँधी से एक विदेशी महिला ने प्रश्न किया कि सत्य को कहाँ पा सकते हैं? गाँधी जी ने उत्तर दिया सत्य को स्वयं के हृदय में ही पा सकते हैं, अन्यत्र नहीं। भारतीय परम्परा में सत्य को नारायण कहा गया है। जैन धर्म में कहा गया है - ‘‘सच्चंखु भयवं‘‘ सत्य ही भगवान है। सत्य रूपी भगवान की उपलब्धि के लिए सत्याचरण अनिवार्य है। अंग्रेजी विचारक इमर्सन ने ठीक लिखा है -  ‘‘सत्य का सबसे बड़ा अभिनंदन जिसे हम कर सकते हैं, वह है सत्य का सर्वतोमुखी आचरण‘‘ सत्याचरण वही कर सकता है जिसके हृदय में परमात्म स्वरूप प्रतिष्ठित रहता है। सत्याचरणी व्यक्ति मन, वाणी और व्यवहार तीनों में सत्य को उतारता है। सत्याचरण को हमें तीन स्तर पर समझना चाहिए - भावना, वाणी और व्यवहार। सत्य भावना, सत्य वाणी और सत्य व्यवहार की त्रिकुटी ही सत्याचरण है। प्रख्यात विचारक इमर्सन ने लिखा है - सत्य का प्रत्येक उल्लंघन मानव समाज के स्वास्थ्य में छुरी भौंकने जैसा है। सत्य का जीवन के साथ वैसा ही संबंध है जैसा कि नदी के साथ उसके जल का। नदी की शोभा और सार्थकता उसमें प्रवाहित हो रहे जल से होती है।
आज का आदमी सुविधाभोगी हो गया है। वह क्षणिक सुविधा और धन की लिप्सा में सत्य आचरण से विमुख हो जाता है। उसका जीवन अनैतिक होता जा रहा है। अनैतिकता के बढ़ते प्रभाव के कारण आज मनुष्य की मान्यताऐं बदल गयी हैं। सामाजिक मूल्य बदल गये हैं। भ्रष्टाचार अब शिष्टाचार बनता जा रहा है। जिस रिश्वत और घूंसखोरी को पाप समझा जाता था। वह अब सुविधा शुल्क कहलाने लगी है। संत कहते हैं अनैतिकता और असत्य से बचकर कर्म क्षेत्र में सच्चाई से काम करना चाहिए। सत्य का आराधक देश, काल और परिस्थितियों का मोहताज नहीं होता। सत्य के पालन के लिये परिस्थितियाँ बाधक नहीं होती। मनुष्य के मन में निष्ठा हो तो संसार का कोई भी काम असंभव नहीं है। राजा हरिशचन्द्र सत्य की प्रतिमूर्ति थे। उनका नाम ही सत्यवादी राजा हरिशचन्द्र हो गया था। महर्षि विश्वामित्र ने उनकी सत्य निष्ठा की कठोर परीक्षा ली। राजा को राजपाट छोड़ना पड़ा, पत्नी व पुत्र और स्वयं को बेचकर दासत्व की पीड़ा सहनी पड़ी। चाण्डाल का कार्य करना पड़ा। इतनी सब विपदाओं, कष्टों के आने पर भी वे सत्य पर अडिग रहे। इतने संकटों के बाद भी सत्य से विचलित नहीं हुए। विश्वामित्र ने भी स्वीकार किया राजा हरिशचन्द्र की सत्य निष्ठा अगाध है इसलिये कहा - ‘‘सत्यमेव जयते नानृतं‘‘ सत्य की सदैव विजय होती है। जीवन का शाश्वत सुख प्राप्त करना है, तो मन, वचन, काय से सत्य आचरण को अपने जीवन में प्रतिष्ठित करना चाहिये।