लोगों के व्यवहार व कार्यो से या तो तुम सहमत होते हो या असहमत। परंतु इतना सदैव याद रखो कि सब कुछ परिवर्तनशील है। इसीलिए किसी भी निर्णय पर अड़े मत रहो वरना तुम्हारी धारणाएं चट्टान की तरह ठोस हो जाती हैं और तुम्हें व औरों को दु:खी करती हैं। यदि निर्णय हवा के झोकों की तरह हल्के हों तो वे सुगंध फैलाकर आगे बढ़ जाते हैं। वे दुर्गध भी फैलाकर जा सकते हैं-परंतु उन्हें हमेशा वहीं नहीं रहना है। निर्णय इतने सूक्ष्म होते हैं कि तुम्हें उनके होने का आभास भी नहीं होता। किसी को निर्णायात्मक ठहराना या समझना भी एक निर्णय है। केवल जब तुम सत्ता के साथ होते हो, प्रेम और अनुकम्पा से पूर्ण, केवल तभी तुम निर्णयों से मुक्त हो सकते हो। पर यह संसार फैसलों के बिना आगे नहीं बढ़ सकता। जब तक तुम अच्छे या बुरे का निर्णय नहीं ले लेते, तुम किसी कार्य को नहीं कर पाते। यदि कोई तुमसे दस बार झूठ कहे तो तुम सोचते हो अगली बार भी शायद वह झूठ ही कहेगा। निर्णय स्वत: ही हो जाता है। परंतु इस संभावना को सदा ध्यान में रखो कि व्यक्ति व वस्तु कभी भी बदल सकते हैं और अपने फैसलों पर अड़े मत रहो।  
हां, अपनी संगति पर तुम्हें निर्णय करना आवश्यक है। तुम्हारी संगत तुम्हें ऊपर उठा सकती है और नीचे भी खींच सकती है। जो संगत तुम्हें संदेह, निरुत्साह, शिकायत, प्रोध, भ्रम और कामना की तरफ नीचे खींचती हैं, वह कुसंगत है। जो संगति तुम्हें आनंद, उत्साह, सेवा, प्रेम, विश्वास और ज्ञान की तरफ ऊपर खींचती है, वह अच्छी संगत है। जब कोई शिकायत करता है, पहले तुम सुनते हो। फिर उसकी हां में हां मिलाते हो, फिर उसके साथ सहानुभूति दिखाते हो; फिर तुम भी शिकायत करने लगते हो। बस, याद रखो, अपने निर्णयों को पक्का मत होने दो।