बिलासपुर
चीफ जस्टिस पीआर रामचंद्र मेनन एवं जस्टिस पीपी साहू की डीबी ने कोल इंडिया की ओर से विवाहित पुत्री को अनुकंपा नियुक्ति नहीं दिए जाने के निर्णय को खारिज किया है। कोर्ट ने विवाहित पुत्री को भी अनुकंपा नियुक्ति के लिए पात्र माना है।

याचिकाकर्ता आशा पांडेय के पिता एसईसीएल झरिया माइंस में लिपिक के पद पर कार्यरत थे। 14 जून 2014 को उनका निधन हो गया। पिता की मौत के बाद विवाहित पुत्री आशा पांडेय ने उनके स्थान पर आश्रित रोजगार (अनुकंपा नियुक्ति) दिलाए जाने आवेदन दिया।

एसईसीएल ने यह कहते हुए आवेदन निरस्त किया कि राष्ट्रीय कोयला वेतन समझौता के तहत विवाहित पुत्री आश्रित रोजगार की पात्रता नहीं है। इसके खिलाफ उन्होंने अधिवक्ता अजय श्रीवास्तव के माध्यम से हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की। इसमें कहा गया कि विवाहित पुत्री को अनुकंपा नियुक्ति नहीं दिया जाना संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 16 का उल्लंघन है।

यदि विवाहित पुत्र को अनुकंपा नियुक्ति दी जा सकती है तो मात्र विवाह होने के आधार पर पुत्री को उक्त लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता है। जस्टिस संजय के अग्रवाल ने 15 मार्च 2016 को आदेश पारित कर राष्ट्रीय कोयला वेतन समझौते के केवल अविवाहित पुत्री को रोजगार देने को गलत ठहराते हुए इसे संविधान के अनुच्छेद 14 व 16 का उल्लंघन माना।

कोर्ट ने विवाहित पुत्र को भी अनुकंपा नियुक्ति के लिए पात्र माना। इस आदेश के खिलाफ एसईसीएल प्रबंधन ने डीबी में रिट याचिका दाखिल की। डीबी ने रिट याचिका में सुनवाई के बाद एकलपीठ के आदेश को निरस्त कर दिया।

इसके खिलाफ याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अजय श्रीवास्तव ने डीबी के समक्ष पुनर्विचार याचिका दाखिल की। चीफ जस्टिस पीआर रामचंद्र मेनन एवं जस्टिस पीपी साहू की डीबी ने पिता पर आश्रित विवाहित पुत्री को भी अनुकंपा नियुक्ति के लिए पात्र माना है। कोर्ट ने एसईसीएल के पक्ष में दिए गए पूर्व के आदेश को निरस्त करते हुए उनकी याचिका को खारिज कर दिया है।