गणपति हिन्दुओं के आदि आराध्य देव होने के साथ-साथ प्रथम पूज्यनीय भी हैं। किसी भी तरह के धार्मिक उत्सव, यज्ञ, पूजन, सत्कर्म या फिर वैवाहिक कार्यक्रमों में सभी के निर्विघ्न रूप से पूर्ण होने की कामना के लिए विघ्नहर्ता हैं और एक तरह से शुभता के प्रतीक भी। ऐसे आयोजनों की शुरुआत गणपति पूजन से से ही की जाती है। 
 
शिव पुराण के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश जी का जन्म हुआ था जिन्हें अपने माता-पिता की परिक्रमा लगाने के कारण माता पार्वती और पिता शिव ने विश्व् में सर्वप्रथम पूजे जाने का वरदान दिया था। तभी से ही भारत में गणेश जी की पूजा और आराधना का किसी न किसी रूप में प्रचलन है जो निरंतर जारी है।
 
गणेशोत्सव के सार्वजनिक पूजा में बदलने की सही तिथि का किसी को भी नहीं पता है लेकिन इतिहास में जो प्रमाण हैं उससे केवल अनुमान ही लगाया जाता है कि ‘गणेश चतुर्थी’ की शुरुआत सन् 1630 से 1680 के बीच मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी के शासनकाल में की गई थी। 
शिवाजी महाराज के बचपन में उनकी मां जीजाबाई यानी राजमाता जिजाऊ ने पुणे में ग्रामदेवता कस्बा में गणपति की स्थापना की थी। तभी से यह परंपरा चली आ रही है। तब हर वर्ष एक सार्वजनिक समारोह के रूप में साम्राज्य के कुलदेवता के रूप में पूजने की प्रथा थी। इसके बाद से निरंतर इस पर्व को किसी न किसी रूप में मनाए जाने के प्रमाण मिलते हैं। 
 
बताते हैं कि पेशवाओं के अंत के बाद यह पर्व एक पारिवारिक उत्सव तक सीमित रह गया था। इसे दोबारा सार्वजनिक रूप से मनाए जाने के कारणों से पहले थोड़ा इतिहास में भी झांकना होगा। दरअसल पेशवा जो कि एक फारसी शब्द है राजा के सलाहकार परिषद यानी अष्ट प्रधान में सबसे खास होते थे, इसीलिए राजा के बाद इन्हीं का स्थान आता था। यह शिवाजी के अष्ट प्रधान मंत्रिमंडल में प्रधान मंत्री अथवा वजीर का पर्यायवाची पद था। 
 
पेशवाई सत्ता के वास्तविक संस्थापन तथा पेशवा पद को वंश परंपरागत बनाने का श्रेय ऐतिहासिक क्रम से सातवें पेशवा, बालाजी विश्वनाथ को है जिनकी दूरदृष्टि ही थी कि मराठाओं का महासंघ बना। यह मराठा महासंघ 1800 ई. में पेशवा के मंत्री नाना फड़नवीस की मृत्यु के बाद उत्पन्न मतभेदों से जूझ रहा था और उधर अंग्रेजों की हैसियत बढ़ रही थी।