शिवपार्वती ने भी विवाह के समय गणेश वंदना की थी 
मुनि अनुसासन गणपतिहि पूजेऊ संभु-भवानी 
कोई सुनै संसय करें। जबि सुर अनादि जियँ जानि।  
रामचरित मानस के बालकाण्ड का यह दोहा है। इसमें यह वर्णित है कि मुनियों की आज्ञा सुनकर शिव पार्वती ने प्रथम पूज्य गणेश जी की पूजा की। यह प्रसंग अद्भुत है। अद्भुत इसलिये क्योंकि बाद में यही गणेश बाद में शिव र्पावती के पुत्र भी हुये। रामचरित मानस के रचयिता तुलसीदास ने बाद में ”शंकर सुवन भवानी नन्दन“ लिखकर गणपति गणेश की वन्दना की हैं। इस प्रसंग में तुलसीदास वह कहते हैं कि इसमें संदेह की बात नहीं हैं। श्री गणेश अनादि देवता हैं।  
गणेश वंदना प्रथम वेद ऋग्वेद में भी है। अथर्व शीर्ष में तो परम्परा गणेश की आराधना में एक सम्पूर्ण पाठ है। अथर्व का अर्थ होता है शिरोभाग। वैदिक परम्परा में गणपति अथर्वशीर्ष का विशेष महत्व है। मांगलिक कार्यों के इसके सर्वप्रथम पाठ की प्रथा प्रचलित है। इसी प्रकार यजुर्वेद की यह ऋचा गणेश वंदना के लिये प्राय: कही जाती है।  
गणानां त्वां गणपतिं हवामहे, प्रियाणां त्वां प्रियपतिं हवामहे। 
निधीनां त्वा निधिपति हवामहे वसो मम, आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम््।।  
”हे परमदेव गणेश जी! समस्त गणों के अधिपति एवं प्रिय पदार्थों- प्रणियों के पालक और समस्त सुखनिधीयों के निधिपति आपका हम आवाहन करते हैं। आप सृष्टिको उत्पन्न करने वाले हैं, हिरण्यगर्भ को धारण करने वाले अर्थात संसार को अपने-आप में धारण करने वाली प्रकृति के भी स्वामी हैं, आपको हम प्राप्त हों।“ 
प्रथम वेद ऋग्वेद में यह प्रार्थना कुछ इस प्रकार है-  
गणानां त्वां गणपतिं हवामहे, कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम््।  
ज्येष्ठराजं ब्रम्हणस्पत आ न: श्रृण्वन्नूतिभि: सीद सादनम््।।  
”हे अपने गणों में गणपति (देव), क्रान्तिदशियों में (कवियों में) श्रेष्ठ कवि, शिवा-शिवके प्रिय ज्येष्ठ पुत्र, अतिशय बुद्धिमान और सर्वज्ञ सुख आदि के दाता, हम आपका आवाहन करते हैं। हमारी स्तुतियों को सुनते हुए पालनकर्ता के रुप में आप इस सदन में आसीन हों।“ 
इस अथर्वशीर्ष के नौवे श्लोक में गणपति का जो स्वरुप बताया गया है वह इस प्रकार है।  
गणपतिदेव एकदन्त और चतुर्बाहु हैं। वे अपने चार हाथों में पाश, अंकुश, दन्त और वरमुद्रा धारण करते हैं। उनके ध्वज में मूषक का चिन्ह हैं। वे रक्तवर्ण, लम्बोदर, शूर्पकर्ण तथा रक्तवस्त्रधारी हैं। रक्तचन्दन के द्वारा उनके अंग अनुलिप्त हैं। वे रक्तवर्ण के पुष्पों द्वारा सुपूजित हैं।  
स्मार्त उपासना पद्धति हो या वैष्णव पूजा सभी में सर्वप्रथम गणेश पूजा का विधान है। अवैदिक दर्शनों में भी गणपति-पूजा की परम्परा रही है। भारत ही नहीं, नेपाल, तिब्बत, कम्बोडिया, चीन जापान आदि देशों में गणेश प्रतिमायें मिली हैं। वास्तव में गणपति पूजा की परम्परा इतनी समृद्ध है कि प्राच्य विद्वान इसे गणेश विज्ञान कहते हैं।  
गणेशजी के स्वरुप की अनेक प्रकार से व्याख्या की गई है। अनेक विद्वान यह मानते है कि गणेश जी का स्वरुप ओंकार का प्रतीक है तो कई इसमें स्वास्तिक की छाया देखते हैं। पतंजलि दर्शन भी गणेश जी का आविर्भाव ब्रम्हरुप ओम्् से मानता है। ओंकार ब्रम्हनादतत्व में वर्षों की जो अभिव्यंजना या उच्चारण है, उसे तंत्रशास्त्र में 52 मातृकाऐं कहते है। इन 52 मातृकाओं अर्थात 52 अक्षरों-वर्णों में श्री गणेश की वन्दना की जाती है। यह श्लोक इस संबंध में उल्लेखनीय है- गणेश गृह नक्षत्र योगिनी राशि रुपिणीम््। देवी मंत्र मयी चैव मातृकां पीठ रुपिणीम््। इन 52 मातृकाओं को शक्ति सहित श्री गणेश बताया गया है।  
गणेश जी के अष्ट विनायक स्वरुप में पूजा की परम्परा अनेक भागों में प्रचलित है। अब यदि इन कथाओं को भावार्थ में ग्रहण करें तो पायेंगे कि हर व्यक्ति के जीवन में स्वभाव से ये आठ प्रवृतियाँ विद्यमान रहती हैं- मत्सर, मद, मोह, लोभ, क्रोध काम, ममता और अभिमान- ये आठ प्रवृतियाँ यदि व्यक्ति पर छा जाती हैं तो इसके कारण व्यक्ति कमजोर होता है। यदि व्यक्ति इन आठ प्रवृतियों पर नियंत्रण कर लेता है तो वह हर विषम परिस्थितियों में विजयी बनकर निकलता है।  
श्री गणेश की पूजा आराधना करने से इन पर नियंत्रण का मार्ग प्रशस्त होता हैं। इन बुराइयों की पराजय सामाजिक विकास के लिये भी आवश्यक होती है।  
यह भी ध्यान देने लायक बात है कि गणेश जी को ऋद्धि और सिद्धि का देवता माना गया है। यदि व्यक्ति अपनी प्रवृत्तियों को, मन को नियंत्रित रखना सीख ले तो सिद्धियाँ प्राप्त होना निश्चित है, लेकिन उसका अपने मन पर नियंत्रण अनिवार्य है। मन चूहे के समान चंचल होता है और उसी की तरह अनियंत्रित होकर उन वस्तुओं को क्षतिग्रस्त करता है जो उसका लक्ष्य होती हैं। गणेश जी द्वारा चूहे की सवारी वास्तव में मन पर नियंत्रण का प्रतीक है। जिस व्यक्ति का अपने मन पर नियंत्रण होता है वही व्यक्ति काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ, अभिमान जैसी आठ बुराईयों पर विजय प्राप्त कर सकता है, अर्थात उनको अपने नियंत्रण में रखकर अभीष्ट लक्ष्य प्राप्त कर सकता हैं।  
विनायक द्वारा इन आठ असुरों के दमन के अनेक रोचक प्रसंग है जिसका निहितार्थ भी प्रेरक हैं। जैसे उन्होंने लोभासुर को पराजित कर पृथ्वी से हटाकर पाताल भेजा। यह लोभासुर कुबेर से उत्पन्न हुआ था। कुबेर को धन का देवता माना जाता है। यह सर्वज्ञात है कि धन ही लोभ का कारण होता है। यदि आप लोभ की प्रवृति को नियंत्रण में नहीं रखेंगे तो आपका पतन निश्चित है। अत: या तो आप लोभ का दमन कीजिए अथवा लोभ के कारण आपका पतन होगा।  
लम्बोदर स्वरुप ने क्रोधासुर को हराया। इसका एक सांकेतिक अर्थ यह भी है कि यदि आप क्रोध को पचा सकें अर्थात क्रोध को अपने स्वभाव पर हावी न होने दे तो यही आपकी बुद्धिमत्ता की विजय है। बुद्धि के देवता श्री गणेश लम्बोदर स्वरुप में क्रोधासुर पर विजय से यही संकेत देते हैं। यह भी कहा जाता है कि उनकी माँ पार्वती की हंसी से मोहासुर का जन्म हुआ था। पुत्र के लिए माँ का मोह ही सबसे बड़ा मोह माना जाता है। मोहासुर को हराकर प्रथम पूज्य गणेश यही प्रेरणा देते हैं। कि मोह कितना ही आकर्षक तथा भावनात्मक क्यों न हो, उस पर नियंत्रण आवश्यक होता है। सूर्य के अभिमान से अभिमानासुर पैदा हुआ। सूर्य के प्रखर तापमय प्रकाश से वह बल पाता था जिसको नियंत्रित करने के लिए उन्होंने स्वयं को धूम्रवर्ण स्वरुप में ढाला तथा अभिमानासुर को नियंत्रित किया। यह तर्क संगत भी है कि यदि प्रकाश की अधिकता से आँखों को कुछ दिखना बंद हो जाए तो धूम्रवर्ण ही राहत प्रदान करता है। इसी प्रकार कथायें बताती हैं कि भवानीनन्दन श्री गणेश ने वक्रतुंड रुप से मत्सरासुर का, एकदंत रुप से मदासुर का, महोदय नाम से मोहासुर का तथा विकट रुप में कामासुर को पराजित किया।  
काम, क्रोध, मद, लोभ, मत्सर, मोह, अभिमान तथा ममता से उत्पन्न होने वाले दोषों का दमन और नियंत्रण बुद्धि के देवता विनायक गणेश की कृपा से ही हो सकता है। संभवत: अष्ट विनायक की पूजा का यही निहितार्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी बुद्धि का विकास कर मनोविकारों पर नियंत्रण कायम कर सके। श्री गणेश को विघ्न विनाशक भी कहा जाता है। यह सच भी है कि मानसिक विकारों से जन्म पाने वाली ये कमजोरियां ही सफलता के मार्ग की सबसे बड़ी विघ्न बाधायें होती हैं।  
काम, क्रोध, मद और लोभ को वैसे भी सबसे बड़ी कमी और व्यक्ति का शत्रु माना गया है। मत्सर, मोह, अभिमान और अंधी ममता के दुर्गुण-इन्हीं दोषों के कारण उत्पन्न होते हैं। व्यक्ति को अपनी इन कमजोरियों या दोषों पर विजय प्राप्त करना है।  
पंचदेव की पूजा भी हमारे यहां प्रचलित है। इन पंचदेवों में गणेश को प्रथम स्थान प्राप्त है। अन्य देवता हैं शिव, शक्ति, विष्णु और सूर्य। गणपति की वंदना सबसे पहले की जाती है। गोस्वामी तुलसीदास ने जब रामचरित्र मानस का प्रणयन प्रारंभ किया तो जेहि सुमिरत सिधि होय, गणनायक करिवर वदन, करऊ अनुग्रह सोय, बुधि राशि सुभ गुन सदन लिखकर सर्वप्रथम सिद्धिदाता गणेश वन्दना की।  
गणेशजी की पूजा सिद्धि और ऋद्धि को आमंत्रित करती है तो मूसक की पूजा हमारे कृषि प्रधान अर्थ व्यवस्था के राष्ट्र में कृषि विनाषक तत्वों के नियंत्रण और नियमन कर प्रतीक है। एक कथा यह भी है, कि श्री गणेश ने मूषक नाम के एक राक्षस को पराजित कर उसे अपना वाहन बना लिखा था। यह राक्षस अपना रुप बदलने में माहिर था। जब वह मूषक रुप में आया तब गणपति ने उसे अपना वाहन बना लिया और कृषि तथा कृषकों को राहत दी।  
इन दिनों गोही पुत्र विनायक की पूजा का देश व्यापी उत्सव मनाया जा रहा है। गणपति पूजा हमें विघ्नों पर विजय और सिद्धि बुद्धि की प्राप्ति का सामयिक संदेश देती है।