02 सितम्बर, वर्ष 2019 विक्रम सं. 2076, भाद्रपद मास, शुक्ल पक्ष, तिथि चतुर्थी श्री गणेश चतुर्थी पर्व :- 
हिन्दु धर्म के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी भगवान श्री गणेश के जन्मोत्सव के रूप में संपूर्ण भारत वर्ष में बडे हर्षोल्लास के साथ मनायी जाती है। इस वर्ष हरतालिका तीज और गणेश चतुर्थी एक दिन यानी सोमवार को एक साथ आ रही हैं। इसलिए इस पर्व का महत्व और बढ़ गया है। यह चतुर्थी श्रद्धा और भक्ति की प्रेरक है, पौराणिक वेदो के अनुसार कहा जाता है, कि इस दिन भगवान गणेश जी का जन्म हुआ था उन्ही के जन्म स्वरूप हर नगर में, राज्य में तथा देश के कई प्रान्तों में भगवान गणेश जी की प्रतिमा बैठायी जाती है, और उनकी भक्ति का गुणगान किया जाता है, हर नगर में, हर प्रान्त में सुंदर झाकियाँ बनायी जाती है, भगवान गणेश बुद्धि और ज्ञान के दाता है, इस तिथि पर भगवान गणेश जी की आराधना करना बडा श्रेष्कर रहता है, भगवान गणेश सव देवों में सर्व पूजनीय प्रथम देव है, किसी भी कार्य को करने से पहले भगवान गणेश की पूजा अर्चना की जाती है, भगवान गणेश विघ्नहरण  मंगल दायक है, भगवान गणेश जी को मोदक अति प्रिय है, श्री गणेश पुराण के अनुसार गणेश जी को 21 दूर्वा चढाना अति फलदायक होता है, अति पावन यह गणेश चतुर्थी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनायी जाती है, यह तिथि सर्व श्रेष्ठ मानी गई है, इस प्रकार सर्व देवों में गणेश जी को ही प्रथम देव गणपति नामों से अलंकृत किया गया है।  

-गणेश चतुर्थी का विधान :- 
भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी गणेश चतुर्थी के नाम से प्रसिद्ध है, इस दिन प्रात:काल स्नानादि से निवृत होकर सोना, तांबा, चांदी मिट्टी या गोबर से गणेश की मूर्ति बनाकर उसकी पूजा करनी चाहिए पूजने के समय इक्कीस मोदकों का भोग लगाते है, तथा हरित दूर्वा के इक्कीस अंकुर लेकर यह दस नाम लेकर चढाने चाहिये- ऊँ गताप नम: ऊँ गोरीसुमन नम:, ऊँ अघनाशक नम:, ऊँ एक दन्ताय नम:, ऊँ ईश पुत्र नम:,ऊँ सर्वसिद्धिप्रद नम: ऊँ विनायक नम:, ऊँ कुमार गुरु नम:, ऊँ इम्भववक्त्राय नम:, ऊँ मूषकवाहन संत नम:, तत्पश्चात इक्कीस लड्डुओं में दस लड्डू ब्राह्मणों को दान देना चाहिए और ग्यारह लड्डू स्वयं खाने चाहिये ऐसा इस व्रत का विधान है, कि जो मनुष्य सच्चे श्रद्धा भक्ति भाव से भगवान गणेश जी की आराधना करता है, तो उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं, और उसे अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है।  

-गणेश चतुर्थी की कथा :- 
एक बार भगवान शंकर स्नान करने के लिए भोगावती नामक स्थान पर गए उनके चले जाने के पश्चात पार्वती ने अपने मैल से एक पुतला बनाया जिसका नाम उन्होने गणेश रखा गणेश को मुदगर देकर द्वार पर बैठा दिया और कहा कि जब तक मै स्नान करूं किसी भी पुरूष को अन्दर मत आने देना। भोगावती पर स्नान करने के बाद जब भगवान शंकर वापस आये तो गणेशजी ने उन्हे द्वार पर ही रोक दिया और प्रुद्ध होकर भगवान शंकर ने उनका सिर धड से अलग कर दिया और अन्दर चले गए तब पार्वती जी ने समझा कि भोजन में बिलम्ब होने से शंकरजी नाराज है, उन्होने फ़ौरन दो थालियों में भोजन परोस कर शंकरजी को भोजन के लिए बुलाया शंकरजी ने दो थालियों को देखकर पूछा कि यह दूसरा थाल किसके लिए है, पार्वती ने जबाब दिया कि यह दूसरा थाल पुत्र गणेश के लिए है, जो बाहर पहरा दे रहा है, यह सुनकर शंकर जी ने कहा कि मैने तो उसका सिर धड से अलग कर दिया है, यह सुनकर पार्वती जी को बहुत दु:ख हुआ और प्रिय पुत्र गणेश को जीवित करने की प्रार्थना करने लगी तब शंकरजी ने तुरन्त पैदा हुए हाथी के बच्चे का सिर काटकर बालक के धड से जोड दिया तब पार्वती जी ने प्रसन्नता पूर्वक पति पुत्र को भोजन कराकर स्वयं भोजन किया यह घटना भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी को हुई थी, इसलिए इस तिथि का नाम गणेश चतुर्थी रखा गया।