निश्चित रूप से भारतीय संस्कृति में महिलाओं ने अपनी श्रध्दा व भक्ति भाव से धर्म व अध्यात्म को पुष्ट किया है ।उन्होंने अपने तप,तेज व साधना से संस्कारों व पवित्रता की मानो पुण्यसलिला ही प्रवाहित कर दी है ।वे साधिका भी हैं,और आराधिका भी ।वर्ष भर हिन्दू महिलाएं अपने व्रतों,उपवासों व भक्ति-शक्ति से परंपराओं व मान्यताओं को पल्लवित-पोषित करती रहती हैं ।यही कहूंगी कि,
"देवी का ही रूप है,भारत की हर नार ।
जो करती है नित्य ही,शुचिता का श्रंगार ।।"
हिन्दू धर्म के प्रमुख व्रत में से एक महत्वपूर्ण व्रत
है,जो महिलाओं के व्दारा किया जाता है ।
हरतालिका व्रत को हरतालिका तीज या तीजा भी कहते हैं। यह व्रत श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हस्त नक्षत्र के दिन होता है। इस दिन कुमारी और सौभाग्यवती स्त्रियाँ गौरी-शंकर की पूजा करती हैं। विशेषकर उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और बिहार में मनाया जाने वाला यह त्योहार करवाचौथ से भी कठिन माना जाता है, क्योंकि जहां करवाचौथ में चांद देखने के बाद व्रत तोड़ दिया जाता है वहीं इस व्रत में पूरे दिन निर्जल व्रत किया जाता है और अगले दिन पूजन के पश्चात ही व्रत तोड़ा जाता है। इस व्रत से जुड़ी एक मान्यता यह है कि इस व्रत को करने वाली स्त्रियां पार्वती जी के समान ही सुखपूर्वक पतिरमण करके शिवलोक को जाती हैं।
सौभाग्यवती स्त्रियां अपने सुहाग को अखण्ड बनाए रखने और अविवाहित युवतियां मन मुताबिक वर पाने के लिए हरितालिका तीज का व्रत करती हैं। सर्वप्रथम इस व्रत को माता पार्वती ने भगवान शिव शंकर के लिए रखा था। इस दिन विशेष रूप से गौरी−शंकर का ही पूजन किया जाता है। इस दिन व्रत करने वाली स्त्रियां सूर्योदय से पूर्व ही उठ जाती हैं और नहा धोकर पूरा श्रृंगार करती हैं। पूजन के लिए केले के पत्तों से मंडप बनाकर गौरी−शंकर की प्रतिमा स्थापित की जाती है। इसके साथ पार्वती जी को सुहाग का सारा सामान चढ़ाया जाता है। रात में भजन, कीर्तन करते हुए जागरण कर तीन बार आरती की जाती है और शिव पार्वती विवाह की कथा सुनी जाती है।
व्रत की महत्ता-
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इस व्रत की पात्र कुमारी कन्यायें या सुहागिन महिलाएं दोनों ही हैं ,परन्तु एक बार व्रत रखने बाद जीवन पर्यन्त इस व्रत को रखना पड़ता है। यदि व्रती महिला गंभीर रोगी हालात में हो तो उसके बदले में दूसरी महिला या उसका पति भी इस व्रत को रख सकने का विधान है।ज्यादातर यह व्रत लगभग पूरे उत्तरी भारत ,राजस्थान,बिहार में मनाते हैं ।महाराष्ट्र में भी इस व्रत का पालन किया जाता है क्योंकि अगले दिन ही गणेश चतुर्थी के दिन गणेश स्थापना की जाती है ।
व्रत की आचार संहिता-
इस व्रत के व्रती को शयन का निषेध है इसके लिए उसे रात्रि में भजन कीर्तन के साथ रात्रि जागरण करना पड़ता है प्रातः काल स्नान करने के पश्चात् श्रद्धा एवम भक्ति पूर्वक किसी सुपात्र सुहागिन महिला को श्रृंगार सामग्री ,वस्त्र ,खाद्य सामग्री ,फल ,मिष्ठान्न एवम यथा शक्ति आभूषण का दान करना चाहिए। यह व्रत बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है. प्रत्येक सौभाग्यवती स्त्री इस व्रत को रखने में अपना परम सौभाग्य समझती है.
यह व्रत सुहागिन के सुहाग को तो सुरक्षित रखता ही है ,साथ ही अगले जन्म में भी उसे मनवांछित वर की प्राप्त कराता है ।कुंवारी कन्याओं को भी सु़योग्य वर प्रदान करने का यह व्रत आधार सिध्द होता है ।
"सच में व्रत हरितालिका,है सूरज का रूप ।
हर नारी पाती सदा,खुशहाली की धूप ।।"