चन्द्रमा की 16वीं कला को 'अमा' कहा गया है जिसमें चन्द्रमा की 16 कलाओं की शक्ति शामिल है। अमा के अनेक नाम आए हैं, जैसे अमावस्या, सूर्य-चन्द्र संगम, पंचदशी, अमावसी, अमावासी या अमामासी।


अमावस्या के दिन चन्द्र नहीं दिखाई देता अर्थात जिसका क्षय और उदय नहीं होता है उसे अमावस्या कहा गया है, तब इसे 'कुहू अमावस्या' भी कहा जाता है। अमावस्या सूर्य और चन्द्र के मिलन का काल है। इस दिन दोनों ही एक ही राशि में रहते हैं।

अमावस्या माह में एक बार ही आती है। मतलब यह कि वर्ष में 12 अमावस्याएं होती हैं। शास्त्रों में अमावस्या तिथि का स्वामी पितृदेव को माना जाता है।

प्रमुख अमावस्याएं : सोमवती अमावस्या, भौमवती अमावस्या, मौनी अमावस्या, शनि अमावस्या, हरियाली अमावस्या, दिवाली अमावस्या, सर्वपितृ अमावस्या आदि मुख्‍य अमावस्या होती है।

1.सोमवती अमावस्या-
सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहते हैं। इस दिन व्रत रखने से चंद्र का दोष दूर होता है। यह सभी मनोकामना पूर्ण करती है। महिलाओं को विशेष रूप से अपने पति के लंबे जीवन के लिए सोमवती अमावस्या व्रत करना चाहिए।

2.भौमवती अमावस्या-
भौम अर्थात मंगल। मंगलवार को पड़ने वाली अमावस्या को भौमवती अमावस्या कहते हैं। इस दिन व्रत रखने से कर्ज का संकट समाप्त होता है।

3.मौनी अमावस्या- यह अमावस्या हिंदू महीने माघ में आती है। इसे आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण दिन माना जाता है।

4.शनि अमावस्या- शनिवार के दिन आने वाली अमावस्या को शनि अमावस्या कहते हैं। इस दिन व्रत रखने से शनि के दोष दूर हो जाते हैं।

5.महालय अमावस्या- महलया अमावस्या को पितृक्ष की सर्वपितृ अमावस्या भी कहते हैं। इस दिन अन्न दान और तर्पण आदि करने से पूर्वजों प्रसन्न होते हैं।

6.हरियाली अमावस्या- श्रावण माह में हरियाली अमावस्या आती है। इसे महाराष्ट्र में गटारी अमावस्या कहते हैं। तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में चुक्कला एवं उड़ीसा में चितलागी अमावस्या कहते हैं। इस दिन पौधा रोपण करने का महत्व है। इस दिन पितरों की शांति हेतु भी अनुष्ठान किए जाते हैं।

7.दिवाली अमावस्या- कार्तिक मास की अमावस्या को दिवाली अमावस्या कहते हैं। इस अमावस्या के समय दीपोत्सव मनाया जाता है। कहते हैं कि इस दिन रात सबसे घनी होती है। मूल रूप से यह अमावस्या माता कालीका से जुड़ी हुई है इसीलिए उनकी पूजा का महत्व है। इस दिन लक्ष्मी पूजा का महत्व भी है। कहते हैं कि दोनों ही देवियों का इसी दिन जन्म हुआ था।

8.कुशग्रहणी अमावस्या- कुश एकत्रित करने के कारण ही इसे कुशग्रहणी अमावस्या कहा जाता है। पौराणिक ग्रंथों में इसे कुशोत्पाटिनी अमावस्या भी कहा गया है। भगवान श्री कृष्ण की आराधना के माह भाद्रपद ही है। इस दिन को पिथौरा अमावस्या भी कहा जाता है। पिथौरा अमावस्या को देवी दुर्गा की पूजा की जाती है।

बाकी बची अमावस्याएं दान और स्नान के महत्व की हैं। वह जिस वार को आती है उसी वार के नाम से जानी जाती है। मूलत: इनके नाम 12 माह के नामों पर आधारित भी होते हैं।

सावधानियां : अमा‍वस्या के दिन भूत-प्रेत, पितृ, पिशाच, निशाचर जीव-जंतु और दैत्य ज्यादा सक्रिय और उन्मुक्त रहते हैं। ऐसे दिन की प्रकृति को जानकर विशेष सावधानी रखनी चाहिए।

इस दिन किसी भी प्रकार की तामसिक वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए। इस दिन शराब आदि नशे से भी दूर रहना चाहिए। इसके शरीर पर ही नहीं, आपके भविष्य पर भी दुष्परिणाम हो सकते हैं। बिहार में इस दिन अधिकतर लोग उपवास करते हैं।