असंतुष्ट होने का अर्थ दुखी होना नहीं है। असल में कोई आदमी पूरी तरह सुखी होकर भी असंतुष्ट हो सकता है। सुखी होने का मतलब है, जो है, उसे आनंद से भोगना। और असंतुष्ट होने का अर्थ है: जो नहीं है उसे आनंद से पैदा करने का श्रम करना। जब अधिकतम लोग समाज में इस भांति श्रम करते हैं तो समाज संपन्न और समृद्ध होता है। और जब अधिक लोग ऐसा सोचते हैं कि जो है बस ठीक है, वही रुक जाना है, तो फिर पूरा समाज धीरे-धीरे दरिद्र हो जाता है। जिंदगी का सारा विकास, जो नहीं है, उसे पाने से ही होता है। इसलिए मैं तो कहूंगा कि ऐसा किसी जगह मानने की जरूरत नहीं है कि अब सब पूरा हो गया, अब भला मुझे क्या करना है! यह मरने के ढंग हैं। यह अपने भीतर जिंदा रहते हुए मर जाना है।  
जब तक श्वास है, तब तक एक भी श्वास व्यर्थ नहीं जानी चाहिए। फिर भी अगर किसी व्यक्ति को ऐसा लगता हो कि मेरी तो सच में ही सारी आवश्यकताएं पूरी हो गईं, तो फिर ऐसे व्यक्ति को दूसरों की आवश्यकताएं पूरा करने में लग जाना चाहिए। अगर किसी व्यक्ति को पक्का ऐसा लगता है कि मेरी तो सभी आवश्यकताएं पूरी हो गईं, मैं क्यों श्रम करूं? तो उसे चारों तरफ देखना चाहिए कि अब मेरा काम तो जमीन पर खत्म हो गया, लेकिन दूसरों की आवश्यकताएं पूरी नहीं हुई हैं, उनके लिए मैं श्रम करने में लग जाऊं।  
लेकिन श्रम से नहीं बचा जा सकता। आपकी अपनी आवश्यकताएं पूरी हो गई हैं, तो अपने चारों तरफ देखिए। बहुत लोगों की पूरी नहीं हुई हैं, अत: उनके लिए श्रम करने में लग जाइए। लेकिन खाली बैठने का हक किसी को नहीं है। संन्यासी को भी खाली बैठने का हक नहीं है। देश को संपन्न करना है तो सभी को श्रम में लगना ही चाहिए। और श्रम में हम तभी लगेंगे जब कोई आवश्यकता पूरी करनी हो। चाहे अपनी, चाहे किसी दूसरे की, लेकिन आवश्यकता पूरी करने की दौड़ जारी रहनी चाहिए। यह दौड़ शांत हो, यह दौड़ आनंदपूर्ण हो, इतना मैं कहूंगा। यह दौड़ पागल की नहीं होनी चाहिए, विक्षिप्त की नहीं होनी चाहिए। यह दौड़ नींद को हराम कर देने वाली नहीं होनी चाहिए। यह दौड़ ऐसी नहीं होनी चाहिए कि आदमी बिल्कुल होश खो दे और दौड़ता रहे, और उसे पता भी न हो कि कहां दौड़ रहा है। यह दौड़ बहुत आनंदपूर्ण होनी चाहिए, यह दौड़ बहुत शांत होनी चाहिए, यह दौड़ बहुत स्वस्थ होनी चाहिए। यह हो सकती है। लेकिन हमने इस तरफ सोचा नहीं