संसार में दो प्रकार का धन होता है भौतिक धन और दूसरा आध्यात्मिक धन। मनुष्य का स्वभाव है कि वह ज्यादा से ज्यादा धन कमाने की चाहत रखता है। कोई व्यक्ति सोना, चांदी, रूपये पैसे का अंबार लगाकर धनवान कहलाता है तो कोई भूखा, प्यासा रहकर भी धनवान कहलता है। वास्तव में धनवान दोनों हैं। एक भौतिक धन का धनी है तो दूसरा अध्यात्मिक धन का धनी है। शास्त्र और पुराण कहते हैं कि दोनों धनों में से अध्यात्म रूपी धन ज्यादा श्रे… है क्योंकि इसे कोई छीन नहीं सकता। इसे कोई चुरा भी नहीं सकता है। जिसके पास अध्यात्म रूपी धन होता है वह निश्चिंत होता है। उसे किसी प्रकार की चिंता और भय नहीं रहता है। संसार में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो एक साथ इन दोनों धनों का सुख प्राप्त कर सके।   
अध्यात्म और भौतिक धन दोनों दो नाव के समान हैं। आप जानते हैं कि दो नाव की सवारी एक साथ नहीं की जा सकती, अगर ऐसा करेंगे तो डूबना तय है। मर्जी हमारी है कि हम अध्यात्मिक धन अर्जित करके ईश्वर का ऋण चुका दें और जीवन-मरण के चप्र को पार करके दु?ख से मुक्ति प्राप्त कर लें। दूसरा रास्ता यह है भौतिक धन अर्जित करके सांसारिक सुख का आनंद लें और बार-बार जीवन-मरण के चप्र में उलझकर पाप का फल प्राप्त करें।   
भागवत् कहता है कि ईश्वर जिसे प्यार करता है उससे उसका सब कुछ छीन लेता है। सब कुछ छीन लेने का अर्थ है सांसारिक सुख छीन लेना। कबीर दास, तुलसीदास, रहीम, मीराबाई, सूरदास, करमैती बाई इसके उदाहरण हैं। ईसा मसीह ने भी कहा है कि सूई के छिद्र से ऊंट भले ही पार कर जाए लेकिन एक अमीर आदमी स्वर्ग प्राप्त नहीं कर सकता। स्वर्ग नहीं मिलने का अर्थ है, ईश्वर की कृपा प्राप्त नहीं होना। इसका कारण यह है कि जब बहुत धन आ जाता है तो व्यक्ति धन संभालने और उसकी सुरक्षा को लेकर ही सदैव चिंतित रहता है। ईश्वर के लिए न तो उनके पास समय होता है और न भक्ति भावना। धन के अहंकार में व्यक्ति ईश्वरीय सत्ता को भी चुनौती देने लगता है। तीर्थस्थलों को पर्यटन स्थल मानकर उनका अपमान करता है। इसलिए ही कहा गया है कि अध्यात्मिक धन और सांसारिक धन एक साथ नहीं मिल सकता है।