अधिक वजन वाली महिलाओं को 40 साल के बाद गर्भाशय (यूट्रस) में फायब्रॉइड ( एक प्रकार की गठान होने ) का खतरा बढ़ जाता है। शुरुआत में रोग के लक्षण नहीं दिखते। मुख्य रूप से लक्षण फायब्रॉइड के आकार, संख्या या वह गर्भाशय की किस दीवार पर है इसपर निर्भर करते हैं। 
गर्भाशय की मांसपेशियों में वृद्धि होकर गांठ का रूप लेने को ही यूट्रस फायब्रॉइड कहा जाता है। ज्यादातर मामलों में ये गांठें कैंसर की नहीं होती हैं पर कुछ मामलों में ये कैंसर में बदल सकती हैं। सोनोग्राफी से गांठ के आकार व जगह का पता चलता हैं।
जगह के अनुसार माहवारी अधिक या इस दौरान रक्त के ज्यादा थक्के निकलना जैसे समस्या होती है। खून की कमी से थकान व कमजोरी रहती है। यूरिन संबंधी परेशानी भी हो सकती है।
कारण 
हार्मोन्स में गड़बड़ी फायब्रॉइड की मुख्य वजह है। विशेषकर अधिक वजन, अधिक उम्र, गर्भनिरोधक दवाएं लेने व गर्भवती महिलाओं में एस्ट्रोजन हार्मोन ज्यादा स्त्रावित होने से फायब्रॉइड बनने लगाता है। गंभीर स्थिति में किडनी में सूजन आ जाती है।
उपचार 
40 से अधिक उम्र की जो महिलाएं बच्चा चाहती हैं उनमें इस गांठ को निकाल देते हैं। वहीं, अधिक उम्र में यूट्रस को पूरी तरह से बाहर निकालना एक विकल्प है। आयुर्वेद में लक्षणों के साथ गांठ के आकार को बढऩे से रोकने पर इलाज होता है। इसके लिए रोगी को जौ का दलिया, सत्तू व रोटी, शाली चावल घी संग खीर बनाकर, गुलाब की पंखुडिय़ां या धागामिश्री खाने को देते हैं। शोधन चिकित्सा में वमन, विरेचन कराते हैं। इमरजेंसी में जब महिला को सामान्य से अधिक ब्लीडिंग हो तो हेमामिलिस, कार्बोनेज दवा अन्य लक्षण, रोगी की स्थिति व गांठ की जगह देखकर देते हैं।
गर्भधारण के अलावा जिनकी फैलोपियन ट्यूब के नजदीक, ग्रीवा के मुंह पर यदि फायब्रॉइड हैं तो इंफर्टिलिटी का खतरा रहता है। गर्भावस्था के साथ यदि फायब्रॉइड हों तो गर्भपात होने की आशंका रहती है। गर्भावस्था के दौरान ये फायब्रॉइड शिशु की सामान्य पोजिशन को भी बदल देती हैं। लंबे समय तक नजरअंदाज करने पर तेज दर्द हो सकता है और महिला कोमा में जा सकती है।