प्रत्येक धर्म शास्त्र मानव को शिक्षा देते हैं कि किसी और की उन्नति, वैभव या संपन्नता को देखकर ईर्ष्या मत करो। यह नसीहत इसलिए दी जाती है क्योंकि आपकी ईर्ष्या से दूसरों पर तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा, मगर आपका स्वभाव जरूर ईर्ष्यालु होकर बिगड़ जाएगा। किसी दूसरे की समृद्धि या उसकी किसी अच्छी वस्तु को देखकर यह भाव आना कि यह इसके पास ना होकर मेरे पास होती तो कितना अच्छा होता, वह चीज हमारे पास ही होनी चाहिए थी। बस यही भाव का मन में आ जाना ही ईर्ष्या है। इस ईर्ष्या से मानव शरीर का अहम अंग मन जलता रहता है और वह कोयले के समान काला पड़ जाता है, जो कि दूसरों का भला सोच ही नहीं सकता है। इस प्रकार ईर्ष्या सीने की वो जलन है, जो पानी से नहीं बुझती, न अन्य किसी दवा से ही इसका इलाज हो सकता है, अपितु स्वयं की सावधानी ही इसे शांत कर सकती है। इसका सीधा अर्थ यही हुआ कि ईर्ष्या की आग बुझती तो अवश्य है किन्तु बल से नहीं, विवेक से। ईर्ष्या वो आग है जो दु:खों को नहीं अपितु आपकी खुशियों को जलाती है। अत: संतोष और ज्ञान रूपी जल से इसे और अधिक भड़कने से रोका जाना चाहिए ताकि आपके जीवन में खुशियाँ नष्ट होने से बच सकें। इसलिए कहा जाता है कि ईर्ष्या में जलो मत कर्म करो और साथ- साथ चलो। क्योंकि खुशियाँ जलने से नहीं अपितु सदमार्ग पर चलने से ही मिला करती है।