वर्तमान समय में अधिकांश मनुष्य विचारों के नाकारात्मक प्रभाव के वशिभूत है। यही वजह है कि संपूर्ण विश्व कहीं न कहीं युद्ध के कगार पर खड़ा नजर आ रहा है। भारतीय ही नहीं दुनिया के  नेताओं और धार्मिक शक्तियों के विचारों में सामंजस्यता नजर नहीं आ रही है।  वर्तमान समाज में मानव कहां जा रहा है और कहां जाना चाहता है, उसे स्वयं पता नहीं है। एक तरह से आज के मानव का कार्य उसकी अपनी इच्छाएं, कामनाएं और महत्वकांक्षाएं तय कर रही हैं। इस वैचारिक धरातल पर मानों सभी एक-दूसरे को मात देने में जुटे हैं। यही वजह है कि नैतिक पतन भी तेजी से हो रहा है। आपसी प्रेम और भाईचारे की बात भी अब लोगों को चुभने लगी हैं। क्योंकि नाकारात्मक सोच के साथ घृणा में बढ़ोत्तरी हो गई है।  इस प्रकार बिना अपने आपको जाने मानव यहां से वहां भटक रहा है उसे खुद नहीं मालूम कि उसकी मंजिल कहां है और वह कहां जा रहा है। कुल मिलाकर परेशान मानव सिर्फ शांति की तलाश में इधर-उधर भटक रहा है। परंतु शांति है कहां? मनुष्य की बढ़ती कामनाएं, महत्वाकांक्षाएं उसे अशांति की ओर ले जा रही हैं। इसलिए कि नाकारात्मक विचारों के पुंज में वह घिर गया है उसे उससे निकलने की आवश्यकता है।