महान से महान व्यक्ति से जब आप मिलते हैं तो उसकी कोई न कोई बात से जरुर प्रभावित होते हैं, ऐसे में उसकी महानता यदि सादगी में नजर आती है तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। एक छोटी से कहानी सुनाता हूं। एक कंपनी के प्रौढ़ व्यवस्थापक ने सामने बैठे व्यक्ति ने जब कहा कि 'नहीं इतना बहुत अधिक है।' यह कहने वाले व्यक्ति की वाणी में जितनी अधिक सरलता थी, सुनने वाले के चेहरे पर उससे कहीं अधिक आश्चर्य के भाव थे। यह बात कहने वाले युवा को व्यवस्थापक ने सिर से पैर तक देखा। साधारण दिखने वाले नवयुवक ने मोटे सूत का कुर्ता, ऐसी ही धोती, पैरों में टायर की सस्ती चप्पलें पहन रखीं थीं। कहीं से भी धनी नहीं दिखता था, फिर क्यों? मन में एक के बाद एक भाव आते जा रहे थे। एक बार पुनः सामने रखी मार्कशीटों प्रमाण पत्रों को उलटा-पलटा कर देखा प्रथम श्रेणी के अंक। योग्यता में भी कोई कमी नहीं फिर बात क्या है। मन की ऊहापोह ने पूछने पर विवश किया, 'आप निर्धारित वेतन से कम क्यों लेना चाहते हैं? जवाब मिला। भाई मुझे दो धोतियाँ, दो कुर्ते तथा सामान्य भोजन की आवश्यकता होती है। मैंने खूब जोड़ घटा कर देख लिया है सब मिला कर 30 रुपये में मेरा काम चल जाता है। इससे अधिक क्या करूँगा।' '30 रुपये अर्थात् दिए जा रहे वेतन से आठवें भाग से भी कम जो भी हो।' 'पर पूरा क्यों नहीं लेते हैं।' पूछने वाले ने फिर सवाल किया 'देखिए अधिक रुपये का मतलब है अधिक विलासिता। विलासिता न हो तो उसे संग्रह कह लीजिए कृपणता कह लीजिए। मतलब एक ही है घनीभूत संकीर्णता और निष्ठुरता। सुनने वाला अब दंग था। अधिक धन को अच्छे कामों में भी लगाया जा सकता है। व्यवस्थापक ने उसे समझाते हुए एक बार फिर कहा। निर्वाह भी प्रधानाचार्य के स्तर के अनुरूप होना चाहिए। इन दो विरोधी बातों की कोई संगत नहीं। धन को अच्छे काम में लगाने की बात ठीक है। पर एक से अधिक तनख्वाह लेने का मतलब है दूसरों के मन में लालच पैदा करना। उन्हें भागने के लिए विवश करना। इसलिए जिम्मेदार आदमी की तनख्वाह कम होना ही ठीक है। रही बात प्रधानाचार्य के स्तर की। तो उसका निर्वाह स्तर नहीं बल्कि जीवन स्तर अन्य सभी की तुलना में अधिक होना चाहिए। जीवन स्तर के ऊँचे होने का मतलब व्यक्तित्व को अधिकाधिक सद्गुणों से युक्त होना। इस सम्बन्ध में मैं प्रयत्नशील हूँ। यह सुन व्यवस्थापक हतप्रभ रह गए। एक साधारण तबके का आदमी जिसका बचपन माँ-बाप के बिना बीता। शुरू से अब तक कष्ट झेलता चला आ रहा है। ऐसी स्थिति में इतनी निस्पृह और उन्नत मानसिकता। उन्होंने रुक कर कहा, 'एक बात पूछूँ।' पूछिए, गरीबी में रहते हुए ऐसी त्यागवृत्ति मन में कैसी पनपी?' वे बोले 'मन में भाव श्रद्धा उमंग पड़े तो गरीब जुलाहे कबीर खुद भूखे रह कर जैसे तैसे कइयों का भूखों का पेट भर सकते हैं और यदि अन्दर निष्ठुरता भरी पड़ी हो तो एक धन कुबेर भी अपने आश्रितों-नौकरों को भूखों मरने पर विवश कर सकता है। संवेदना उपजे तो सादगी आए बिना रह ही नहीं सकती।' ये प्रधानाचार्य कोई और नहीं बल्कि श्री दीनदयाल उपाध्याय जी थे जिन्होंने सादगी का अर्थ समझाया और स्थापित किया।