व्यक्ति सुनता है तो विचार करता है, लेकिन जो सुनता ही नहीं है वह विचार आखिर कैसे कर सकता है। इसी संदर्भ में बताया जाता है कि तुम्हारे मन पर सतत् चारों तरफ से तरह-तरह के विचारों का आक्रमण होता है। स्वयं का बचाव करने के लिए हर मन ने प्रतिरोध की एक सूक्ष्म दीवार बनाई हुई है ताकि ये विचार वापस लौट जाएं और मन में प्रवेश न कर सकें। वैसे तो यह अच्छा होता है लेकिन धीरे-धीरे यह प्रतिरोध इतने अधिक बड़े हो जाते हैं कि कुछ समय बाद ये किसी भी तरह की बातों और विचारों को अंदर नहीं आने देते। अगर तुम चाहोगे भी तो भी तुम्हारा उन पर कोई नियंत्रण नहीं रह जाता। ऐसे प्रतिरोध को रोकने का वही तरीका है जिस तरह तुम अपने स्वयं के विचारों को रोकते हो। सिर्फ अपने विचारों के साक्षी बनो और जैसे-जैसे तुम्हारे विचार विलीन होने शुरू होंगे, इन विचारों को रोकने के लिए प्रतिरोधों की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी। वे झड़ने लगेंगे, पेड़ के सूखे पत्तों की तरह। ये सारे सूक्ष्म तत्व हैं, तुम उन्हें देख न पाओगे लेकिन तुम्हें उनके परिणाम जरुर समय-समय पर महसूस होंगे। जो व्यक्ति ध्यान से परिचित है वही सुनने की कला जानता है और इससे उलटा भी सच है कि जो आदमी सुनने की कला जानता है वह ध्यान करना जानता है क्योंकि दोनों एक ही बात है। सदियों से हर किसी के लिए यह एकमात्र उपाय रहा है, स्वयं की वास्तविकता और अस्तित्व के रहस्य के करीब आने का। जैसे-जैसे तुम करीब आने लगोगे, तुम्हें अधिक शीतलता महसूस होगी। तब तुम स्वंय को प्रसन्न अनुभव करोगे। एक बिंदू आता है जब तुम आनंद से इतने भर जाते हो कि उसे तुम पूरी दुनिया के साथ बांटने लगते हो और फिर भी तुम्हारा आनंद उतना ही बना रहता है। इसलिए सुनना सीखें ध्यान तो करना भी आ जाएगा।