इन्दौर । केवल अपने अनुभव से ही नहीं, दूसरों के अनुभव से भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है। यदि किसी की गाड़ी का एक्सीडेंट 100 किमी की रफ्तार से हुआ है तो इस दुर्घटना से भी हमें सबक लेने की जरूरत है। दान वही उत्तम होता है, जिसे देने के लिए हमें योग्य पात्र को ढ़ूंढना पड़े। मध्यम दान वह होता है जब हम स्वयं दान देने के लिए किसी को बुलाते हैं लेकिन अधम दान वह होता है जो याचना करने के बाद दिया जाता है। निष्फल दान उसे माना गया है जब हम दान देने के पहले अपने स्वार्थ या काम की बात करें। दान देने की क्रिया और आदत नहीं, बल्कि दान देने का स्वभाव होना चाहिए।
राष्ट्र संत, पद्मविभूषण प.पू. आचार्य रत्नसुंदर सूरीश्वर म.सा. ने आज सुबह तिलक नगर जैन श्रीसंघ एवं श्वेतांबर ट्रस्ट के तत्वावधान में आयोजित धर्मसभा में उक्त प्रेरक बातें बताई। आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य को अपने गलत कामों के लिए मौका मिलने पर रोना भी चाहिए। चोरी करना, झूठ बोलना या अन्य कोई ऐसे दोष जिनके बारे में लोगों को भले ही पता नहीं चल पाया हो, स्वयं को रोना भी चाहिए। दुख के लिए नहीं, दोष के लिए अवश्य रोएं। हमारा व्यक्तित्व कुछ इस तरह का होना चाहिए कि कोई हमें प्रलोभन या अन्य किसी आकर्षण के लिए आफर ही नहीं कर सके। हमारी पहचान ऐसे व्यक्ति के रूप में बनना चाहिए कि किसी का साहस न हो कि वह हमें अपने कर्तव्य से डिगा सके। इसी तरह हमारा ईगो भी ऐसा हो हम कभी गलत काम का समर्थन नहीं कर सके। सीधी सी बात है कि यदि कोई गलत काम करता है तो वह काम हम भी कर सकते हैं और यदि कोई आदमी अच्छा काम करता है तो वही अच्छा काम हम भी कर सकते हैं।
आचार्यश्री ने आज अपने प्रवचन में अंग्रेजी के पांच अक्षरों को घटते क्रम में कुछ इस तरह समझाया कि पहला अक्षर ‘लर्न’ जिसमें अंग्रेजी के पांच अक्षर आते हैं, दूसरा ‘गिव’ जिसमें चार, तीसरा ‘क्राय’ जिसमें तीन, चैथा ‘नो’ जिसमें दो और अंत में ‘आई’ जिसमें इकलौता अक्षर है, इस तरह उन्होंने अपने व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाने के लिए बहुत सरल तरीके से अपनी बात समझाई। प्रारंभ में तिलक नगर जैन श्रीसंघ की ओर से कल्पक गांधी, अनिल रांका, संदीप पोरवाल, संजय जैन, वीरेंद्र बम आदि ने आचार्यश्री एवं साधु-साध्वी भगवंतों की अगवानी की। चातुर्मास समिति के कल्पक गांधी ने बताया कि आचार्यश्री के प्रवचन शनिवार 29 एवं रविवार 30 जून को जानकी नगर में सुबह 9 से 10 बजे तक होंगे।