यदि कभी मन में आत्महत्या का विचार आ भी जाए तो एक बार जरुर सोचें कि यह अनमोल शरीर क्या फिर कभी मिलने वाला है। इसे समझाने के लिए यहां एक कहानी प्रस्तुत है। यथा- एक समय की बात है, एक व्यक्ति नदी के किनारे आत्महत्या करने गया। पास ही सन्त की कुटिया थी। सन्त यह सब होते देख रहे थे। वह नदी में कूदने ही वाला था कि सन्त ने जोरदार आवाज लगाई। 'ठहर' जरा। उसने कहा मुझे रोको मत। मुझे मरना है। जिन्दगी बेकार हो चुकी है। अब यहाँ कुछ भी शेष नहीं है। मुझसे तो परमात्मा भी रूठ गया है सबको निहाल कर दिया है मेरे पास कुछ भी नहीं है। सन्त ने आग्रह करते हुए कहा, आज मेंरे कहने से रातभर ठहर जा। चाहे तो कल फिर मर जाना। सन्त की बात उसे समझ में आई तो वह रात भर के लिए ठहर गया। प्रातः सन्त उस व्यक्ति को लेकर राजमहल पहुँचे। सारा वृत्तांत सुनाया। फिर उसे आकर कान में कहा कि इस राजा को तुम्हारी आँखों की आवश्यकता है। एक लाख रुपया दे रहे हैं। एक आँख का। दोनों दे दोगे तो दो लाख दे सकते हैं। उसने कहा मैं आँखें बेच दूँ फिर दुनिया कैसे देखूँगा?  सन्त फिर राजा के पास गया। थोड़ी देरबाद लौट कर आया और बोला 'यदि कान भी देते हो तो चार लाख रुपया वो तुम्हें दे देंगे और नाक देनी हो तो पाँच लाख। उसने कहा, इसका क्या मतलब। मैं आँख, कान, नाक बेच दूँ। संत ने कहा राजा तो हाथ, पैर भी खरीदने को तैयार हैं। तू चाहे तो सबका सौदा तय कर ले दस लाख देंगे। अब तो वह चकराया कि मात्र शरीर की इतनी कीमत मिल रही है। सन्त ने कहा, तूने कभी अक्ल लगाकर सोचा कि यह दुर्लभ तन जो तुझे मिला है इसे यूं ही इस प्रकार नष्ट करने पर तू उतारु है। लाखों करोड़ों लोग तुझसे भी गई बीती स्थिति में हैं। उस आत्महत्या करने को आतुर इंसान की समझ में आ गया कि वह गलत करने जा रहा था। इस प्रकार उसने समझा मानव जीवन का महत्व और आत्महत्या का इरादा छोड़ कर्म करने में जुट गया।