नई दिल्ली । अस्थमा की बीमारी आज आम समस्या बनती जा रही है। लक्षणों के आधार अस्थमा के दो प्रकार होते हैं- बाहरी और आंतरिक अस्थमा। बाहरी अस्थमा बाहरी एलर्जन के प्रति एक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया है, जो कि पराग, जानवरों, धूल जैसे बाहरी एलर्जिक चीजों के कारण होता है। आंतरिक अस्थमा कुछ रासायनिक तत्वों के श्‍वसन द्वारा शरीर में प्रवेश होने से होता है जैसे कि सिगरेट का धुआं, पेंट वेपर्स आदि। अस्थमा के लिए जेनेटिक कारणों के साथ ही प्रदूषण और एलर्जी काफी हद तक जिम्मेदार है। सही समय पर सही इलाज शुरू करके इसे काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। महिलाओं की तुलना में पुरुषों में अस्थमा का खतरा ज्यादा है। महिलाओं में पाए जाने वाला विशेष हार्मोन स्ट्रोजन उन्हें इससे बचाता है। इसकी एक प्रमुख कारण वजन, महिलाओं की तुलना में पुरुषों का आउटडोर मूवमेंट ज्यादा होना है। इसलिए पुरुषों को अपने फेफड़े की सुरक्षा के लिए विशेष रूप से सतर्क रहना चाहिए। वायु प्रदूषण का बढ़ता स्तर, धुम्रपान, बचपन में सही इलाज न मिलना, एग्जिमा, एलर्जी, कॉमन फ्लू और वायरल इन्फेक्शन के कारण अस्थमा हो सकता है। अधिकतर लक्षणों के आधार पर मर्ज का निदान (डायग्नोसिस) किया जाता है। इसके अलावा कुछ परीक्षण करके जैसे सीने में आला लगाकर, म्यूजिकल साउंड (रान्काई) सुनकर और फेफड़े की कार्यक्षमता की जांच (पीईएफआर और स्पाइरोमेट्री) द्वारा की जाती है। अन्य जांचों में खून की जांच, सीने और पैरानेजल साइनस का एक्सरे कराया जाता है। अस्‍थमा का इलाज डॉक्टर की सलाह से इनहेलर चिकित्सा लेना है। इलाज की अन्य विधियों जैसे - ओमेलीजुमेब या एन्टी आईजीई थेरेपी और ब्रॉन्कियल थर्मोप्लास्टी आदि की जरूरत पड़ने पर मदद ली जाती है।अस्‍थमा फेफड़ों की एक बीमारी है जिसके कारण सांस लेने में कठिनाई होती है। अस्थमा होने पर श्वास नलियों में सूजन आ जाती है जिस कारण श्वसन मार्ग सिकुड़ जाता है। श्वसन नली में सिकुड़न के चलते रोगी को सांस लेने में परेशानी, सांस लेते समय आवाज आना, सीने में जकड़न, खांसी आदि समस्‍याएं होने लगती हैं।