अक्षर ब्रम्ह भगवान श्री चित्रगुप्त जी एक प्रमुख हिन्दू देवता हैं। मिथकों और पुराणों के अनुसार धर्मराज चित्रगुप्त अपने दरबार में मनुष्यों के पाप-पुण्य का लेखा-जोखा कर के न्याय करने वाले बताए गये हैं।चित्रगुप्त को न्याय का देवता माना जाता है। मनुष्यों की मृत्यु के पश्चात, पृथ्वी पर उनके द्वारा किए गये कार्यों के आधार पर उनके लिए स्वर्ग या नरक का निर्णय लेने का अधिकार चित्रगुप्त के पास है। अर्थात किस को स्वर्ग मिलेगा और कौन नरक मे जाएगा? इस बात का निर्धारण चित्रगुप्त द्वारा ही किया जाता है।
चित्रगुप्त या धर्मराज पाप-पुण्य के अनुसार न्याय करने वाले, यमराज भी इनके आज्ञा पालक हैं ।उनका
आवास यमपुरी या संयमनीपुरी में है। उनकी पूजार्थ
मंत्र है-"ॐ यमाय धर्मराजाय श्री चित्रगुप्ताय वै नमः" ।
वैदिक एवं पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कायस्थों को चित्रगुप्त भगवान का वंशज बताया जाता है।
भगवान श्री चित्रगुप्त , आदि , अनादि , अनंत , सर्वेश्वर , सर्वांतर्यामी , परात्पर परब्रह्म ,परमेश्वर , अजन्मा ,अमरणा है किसी काल विशेष में उनकी उपस्थिति हो ऐसा बिल्कुल नहीं है सर्व काल में विद्यमान परात्पर परब्रह्म है भगवान श्री चित्रगुप्त ।
सृष्टि संचालन हेतु श्री चित्रगुप्त जी का प्रकट होना -
समस्त सृष्टि की रचना के बाद , सृष्टि संचालन हेतु ब्रम्ह देव ने ११००वर्षों की तपस्या की ,जिसके उपरांत ब्रम्ह देव को परब्रम्ह / अक्षर ब्रम्ह भगवान श्री चित्रगुप्त जी के स्वरुप का दर्शन हुआ |
चित्रम उदगाद’ विचित्र देव प्रगट हुए, ब्रह्राा के मुख से निकल पड़ा ‘चित्रम’, आप महान आश्चर्य हैं, विचित्र हैं आप। मैं नहीं जानता आप ही बताइये आप कौन हैं ? मेरी सृषिट से आप परे हैं।
"प्रकृति पार प्रभु सब उर वासी,
ब्रह्रा निरीह विरज अविनासी।"
आप सम्पूर्ण प्रकृति से पार हैं। मेरी इस श्रेष्ठ कृति (प्रकृति) में आपकी गिनती नहीं है। आप प्रकृति से परे हैं। देवानाम आप सभी देवताओं से दिव्य हैं। दिव्यताओं के स्रोत हैं। सौन्दर्य के भी सौन्दर्य हैं। प्रकाशों के भी प्रकाश हैं ।
"न तत्र सूर्या भाति न चन्द्र तारकम
नेमा विधुतो भानित कुतोअयमगिन।
तमेव भान्तं अनुभाति सर्वम,
तस्य भासा सर्वमिदम विभाति। "
    अर्थात सूर्य का प्रकाश आपके सामने निरस्त है, जैसे तारे सूर्य के सामने नहीं चमकते वैसे सूर्य आपके समक्ष निस्तेज है। न चन्दमा ही आपके सामने चमकता न तारक मण्डल। विधुत की दीपित आपके सामने तेज रहित है, इस अगिन की तो कोई गिनती ही नहीं। वस्तुत: आपके प्रकाश से ही ये सब प्रकाशित है। इनमें अपना प्रकाश नहीं है। इन सबके प्रकाशक आप हैं। चित्रगुप्त जी बोले – मैं एकदेशीय नहीं हूं कि कहीं बैकुण्ठ कैलास, काशी, मथुरा, अयोध्या आदि में रहूं,  मैं तो इन सबमें सर्व व्यापक हू, सर्वत्र हूं-

"आप्रा दयावा पृथिवी अन्तरिक्षम"
इस धरती के कण-कण में इसके ऊपर सम्पूर्ण अन्तरिक्ष में, जहा सूर्यादि ग्रह घूम रहे हैं, इन ग्रहों से भी परे धौ लोक में, सर्वत्र मैं विराजमान हूं।
"देश काल दिशि विधि घटु माही,
कहहु सो कहां जहा प्रभु नाही।
हरि व्यापक सर्वत्र समाना
प्रकृति पार प्रभु सब डर वासी।।"
अर्थात, मैं सब के हृदय में निवास करता हू, घट-घट में समाया हू प्रकृति में देश काल दिशा विदिशा में व्याप्त हू और इनसे परे भी हूं।
श्री चित्रगुप्त कथा में कहा गया है- "वह कायस्थ है,काया में सिथत है। उसे शरीर से बाहर वास्तविक रुप में कोई नहीं देख सकता। बाहर तो उसका केेेवल मायिक रुप ही दिखााई देता है।,अवतरित रुप दिखता है। जब वह भक्तों के पुकारने पर साकार बनता है, सगुण बनता है तब अपने धारित रुप में दिखता है।
उसका माया रहित स्वरुप तो कायस्थ है। हृदयस्थ है, आत्मस्थ है। काया देह और शरीर का वास्तविक अर्थ एक ही नहीं है। शरीर तो वह है जो जीर्ण शीर्ण होता रहता है। देह वह है जिसका दहन किया जाता है। किन्तु काया इनसे दिव्य है।
शरीर पंच कोशात्मक है, उनमें आनन्दमय कोश में जीवात्मा बसती है। परमात्मा सर्व व्यापक होने से जीवात्मा का भी अन्तरात्मा है। अत: जीव उसे अपने भीतर ही देख पाता है। क्योंकि वह आत्मस्थ है, हृदयस्थ है, कायस्थ है।
विधाता बोले – आप कायस्थ हैं। चित्रगुप्त हैं। हमारे पास चौदह इन्द्रियां हैं। पाच कर्मेनिद्रयां और चार अन्त: इन्द्रियां, जिसको अन्त: करण चतुष्टय कहा है। अन्त: करण में मन ,बु़ुद्धि, चित्त और अहंकार चार विभाग हैं।
चित्त वह अनुभाग है जो हमारे प्रत्येक अनुभव, विचार, कार्य और संवेदनाओं के चित्र खींच लेता है। चित्त एक दिव्य फोटो कैमरा है। इसमें आकार का ही नहीं विचार तक का चित्र आ जाता है कि अनेक जन्मों के चित्र इसमें जमा हैं। इन चित्तस्थ चित्रों को शास्त्रीय भाषा में संस्कार कहा है।
इन चित्रों में हमारे कर्मों का खाता अंकित है। ये चित्र जन्म जन्मान्तरों के कर्मों के रुप हैं। चित्रगुप्त वे दिव्य देवता हैं जो इन चित्रों का गोपन करते हैं, संरक्षण करते हैं। जो इन चित्रों के स्वामी हैं, चित्रगुप्त हैं। इन चित्रमय खातों को देखकर ही प्राणी के कर्मों को पढ़ते हैं तथा निर्णय करते हैं, दु:ख-सुख प्रदान करते हैं।वे 
पुकारने पर अवतरित होते हैं। कर्म फलों के दाता हैं, अच्छे बुरे कर्मों के निर्णायक हैं। देव, दानव, यक्ष, किन्नर, ब्रह्राा, विष्णु, महेश सभी उनके न्याय क्षेत्र में आते हैं।
रामावतार के समय बाली को छिप कर मारा तो कृष्णावतार में भील का बाण खाकर बदला चुकाना पड़ा। तुलसी के शाप से सालग्राम को पत्थर बनना पड़ा। नारद के शाप से नाभी विरह में भटकना पड़ा। सभी को भगवान चित्रगुप्त की न्याय तुला पर खरा उतरना पड़ता है।
अतः भगवन श्री चित्रगुप्त जी को ब्रम्ह देव का मानस पुत्र कहाँ सर्वथा अनुचित एवं गलत है | और समस्त मानव जाती के लिए पूजनीय है इसलिए सभी लोगो को भगवान् श्री चित्रगुप्त जी की पूजा अवस्य करनी चाहिए |
परब्रम्ह / अक्षर ब्रम्ह भगवान श्री चित्रगुप्त जी की पूजा तिथि :- 
(1) परब्रम्ह भगवान श्री चित्रगुप्त जी की प्रकटोत्सव , चैत्रवंशी / कायस्थ वंश के लोगो के द्वारा चैत्र मास के शुक्लपक्ष के पूर्णिमा तिथि को पूरे भारत देश में मनाया जाता है |
(2) परब्रम्ह / अक्षर ब्रम्ह भगवान श्री चित्रगुप्त जी की पूजा चैत्रवंशी / कायस्थ वंश के लोगो के द्वारा कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष के द्वितीय तिथि को यम द्वितीया के दिन कलम -दवात , पुस्तक एवं तलवार की पूजा करके किया जाता है ।
ॐ श्री चित्रगुप्ताय नमः का जाप किया जाता है।   
हिंदुओं के हिन्दी संवत् मास चित्रमास है जो अपभ्रंश होकर चैत्रमास हो गया है। यह मास चित्रगुप्तजी के नाम से है।  इसी चित्रमास के पूर्णिमा को चित्र (चित्रा) नक्षत्र में ब्रह्माजी जी द्वारा 11000 साल की तपस्या करने के उपरांत श्री चित्रगुप्तजी भगवान  मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले में उज्जैन की क्षिप्रा नदी के तट पर प्रकट हुए थे।
उज्जैन में ही काफी पौराणिक चित्रगुप्त मंदिर भी है जहाँ प्रसाद के रूप में कलम, दवात चढ़ाया जाता है जिससे प्रसन्न होकर श्री चित्रगुप्त भगवान वर देते हैं। 
तो आइए, हम सभी कायस्थ अपने कुलदेव भगवान चित्रगुप्त की आराधना कर फल प्राप्त करें।