नई दिल्ली । एक ताजे अध्ययन में पता चला है कि  40 साल से अधिक उम्र का हर तीसरा इंसान सेक्सुअल हॉर्मोन की कमी से जूझ रहा है। इसे टेस्टोस्टेरॉन डिफिशिएंसी सिंड्रोम कहा जाता है। हालांकि, अब औरतों की तरह पुरुषों में भी सेक्स हॉर्मोन रीप्लेसमेंट संभव हो गया है। 745 लोगों पर की गई एक अध्ययन में यह बात सामने आयी है। इन सबके बावजूद यह देखने में आ रहा है कि लोग इलाज के लिए आगे नहीं आते। अध्ययन में शामिल लोगों में से 60,17 प्रतिशत लोग टेस्टोस्टेरॉन डिफिशिएंसी सिंड्रोम (टीडीएस) के मरीज पाए गए। डायबिटीज, हाइपरटेंशन और हार्ट के मरीजों में टीडीएस का खतरा ज्यादा पाया गया। टेस्टोस्टेरॉन पुरुषों में सेक्सुअल क्षमता को बनाए रखता है। लेकिन जब इसकी कमी होती है तो सेक्स से जुड़ी कई तरह की परेशानी शुरू हो जाती है। 40 साल की उम्र के बाद टेस्टोस्टेरॉन का लेवल हर साल 0,4 से 2,6 प्रतिशत तक कम हो जाता है। डॉक्टरों का कहना है कि लगातार यह परेशानी बढ़ रही है। अस्पताल ने 745 लोगों पर स्टडी की गई। टीडीएस का पता लगाने के लिए बिना जांच किए लक्षण के आधार पर पता लगाया गया। इसके लिए 10 सवाल पूछे गए। डॉक्टर ने बताया कि सेक्स के प्रति रुचि यानी कामेच्छा, क्षमता यानी स्टैमिना और स्ट्रेंथ में कमी जैसे तीन लक्षणों के आधार पर 48.18 प्रतिशत लोगों में टेस्टोस्टेरॉन कम पाया गया। लेकिन जब इन सभी का बायोकेमिकल टेस्ट किया गया तो आंकड़ा बढ़कर 60.17 प्रतिशत हो गया। 
विशेषज्ञों का कहना हैं कि इस स्टडी से यह साफ हो रहा है कि हमारी आबादी में हर तीसरा इंसान सेक्स हॉर्मोन की कमी से पीड़ित है। उन्होंने कहा कि जब लोग डायबीटीज, हाइपरटेंशन, विटमिन डी की कमी, हार्ट डिजीज जैसी बीमारी से पीड़ित होते हैं तो उनमें टीडीएस यानी टेस्टोस्टेरॉन की कमी का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। स्टडी में पाया गया कि जो लोग नॉन डायबीटीक थे उनमें टीडीएस का स्तर 52.8 पर्सेंट था और डायबीटीज वालों में यह 71.03 पर्सेंट था। इसी प्रकार हाई बीपी के मरीजों में टीडीएस का खतरा 72.89 पर्सेंट पाया गया और नॉन बीपी वालों में यह केवल 54.86 पर्सेंट था। कोरोनरी हार्ट डिजीज के 32 मरीज भी इस स्टडी में शामिल हुए थे इमसें से 27 यानी 84.30 पर्सेंट में टीडीएस की बीमारी थी। विशेषज्ञों का मानना है कि लोगों को जब पता चल जाता है कि उनके शरीर में सेक्स हॉर्मोन की कमी है उसके बाद भी वे समाज के डर से डॉक्टर के पास जाने से परहेज करते हैं। लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि यह भी एक प्रकार की बीमारी है और इसका इलाज संभव है। बस जरूरत है कि आप सोशल टैबू को भूल कर इलाज के लिए आगे आएं। इसका इलाज हॉर्मोन रीप्लेसमेंट से संभव है। डॉक्टरों के मुताबिक, ऐसे लोग जिनकी उम्र ज्यादा है और वे डायबीटीज, हार्ट डिजीज, बीपी, विटमिन-डी की कमी से जूझ रहे हैं उन्हें हर साल टीडीएस की जांच करानी चाहिए।