रायपुर । दाऊ कल्याण सिंह (डीकेएस) सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल के पूर्व अधीक्षक एवं डीकेएस में 50 करोड़ की गड़बड़ियों के आरोपी डॉ. पुनीत गुप्ता के विरुद्ध एक और बड़ा खुलासा हुआ है। इस बार सरकारी संपत्ति और सरकारी पैसे का दुरुपयोग नहीं, बल्कि उनकी पोस्ट ग्रेजुएशन (पीजी) डिग्री और असिस्टेंट से एसोसिएट और प्रोफेसर पद पर हुई पदोन्नति पर सवाल खड़े हो गए हैं। शासन ने इस पर चिकित्सा शिक्षा संचालक से जानकारी मांगी, जो पं. जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल मेडिकल कॉलेज डीन के मार्फत शासन को भेज दी गई है। सूत्रों के मुताबिक डॉ. गुप्ता ने 10 महीने में तीन बार पीजी का विषय बदला लिया, तो चार साल दो माह में असिस्टेंट प्रोफेसर से प्रोफेसर बन गए, जो मुमकिन ही नहीं है।
दस्तावेजों से यह भी खुलासा हो रहा है कि इस्तीफा के बाद उन्हें फिर से असिस्टेंट प्रोफेसर पर नियुक्ति दे दी गई। यह नियुक्ति 30 जुलाई, 2011 को हुई। वे नौ अगस्त, 2015 को प्रोफेसर बन गए यानी तमाम नियमों को दरकिनार करते हुए सिर्फ चार साल दो महीने में। सूत्र यहां तक बताते हैं कि 2015 में हुई प्रोफेसर पद पर पदोन्नति में डॉ. गुप्ता सीधा-सीधा लाभ पहुंचाया गया है। सब कुछ तत्कालीन सरकार के कार्यकाल में हुआ। बता दें कि जब डॉ. गुप्ता पीजी कर रहे थे और उनकी नियुक्ति मेडिसिन विभाग में हुई तो इस दौरान उनके पिता डॉ. जीबी गुप्ता मेडिसिन विभागाध्यक्ष थे।
9 अप्रैल 2010- असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर जॉइनिंग दी। 2008 पीएससी के तहत हुए थे चयनित। (9 फरवरी, 2011 को आठ दिन, 17 फरवरी, 2011 को छह दिन और फिर 23 फरवरी से चार अक्टूबर 2011 तक 163 दिन के अवकाश पर थे। इसी दौरान इस्तीफा दिया था, फिर जॉइनिंग दी।

3 अक्टूबर 2013- एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर पदोन्नति। (तीन साल छह महीने में पदोन्न्ति, जबकि इसके लिए नियम पांच साल के हैं। पांच साल पूरे न भी हों तो कम से कम दो पेपर पब्लिकेशन एमसीआइ नॉर्म्स के मुताबिक जर्नरल में प्रकाशित होने चाहिए। डॉ. गुप्ता सुपरस्पेशलिस्ट डिग्रीधारी थे तो उनके लिए दो साल का प्रावधान है। इस दौरान संविदा सेवा काउंट की गई थीं। जो इससे पहले कभी भी नहीं हुआ था।)
डॉ. गुप्ता ने 1999-2000 में पीजी की डिग्री हासिल की, मगर इस डिग्री को लेकर भी बड़े सवाल हैं, जो जांच में सामने आए हैं। इससे संबंधित रिपोर्ट शासन के आदेश पर मेडिकल कॉलेज डीन डॉ. आभा सिंह ने तैयार की। सूत्र बताते हैं कि डॉ. गुप्ता ने पहले रेडियोथैरेपी की सीट पर दाखिला लिया, पढ़ाई शुरू कर दी। बाद में सर्जरी में सीट आबंटित हो गई, कैसे बड़ा सवाल है। यहां पढ़े फिर सीट छोड़कर मेडिसीन जॉइन कर ली। 10 महीने में एक विभाग की पीजी सीट से दूसरे, दूसरे से तीसरे पर दाखिला लिया। तत्कालीन कॉलेज प्रबंधन ने बगैर किसी आपत्ति के दाखिले दिए। सत्र 1999-2000 में एमडी मेडिसीन में पीजी अवार्ड हो गया। तीन साल यानि 36 महीने का पीजी कोर्स 26 महीने में पूरा किया गया। छत्तीसगढ़ मेडिकल काउंसिल के दस्तावेजों को कंपाइल करते हुए डीन ने तमाम जानकारी शासन को भेज दी है।

शासन को एक लिखित शिकायत हुई थी। शासन का पत्र मुझे प्राप्त हुआ था, जिसके आधार पर जांच करवाई गई। रायपुर मेडिकल कॉलेज डीन ने टिप्पणी लिखी है। मैंने उसे शासन को भेज दिया है। नियुक्ति शासन ने की है, इसलिए आगे की कार्रवाई शासन स्तर पर ही होगी। - डॉ. एसएल आदिले, संचालक, चिकित्सा शिक्षा संचालनालय