जबलपुर। भीषण गर्मी को देखते हुये कक्षा एक से लेकर कक्षा पांचवी तक के बच्चों के लिय स्कूलों में अवकाश घोषित करने के आदेश को लेकर शिक्षा विभाग ने कलेक्टर की फजीहत करा दी। शिक्षा विभाग में नौकरशाहों ने शासन को प्रस्ताव भेजे बगैर कलेक्टर से अवकाश घोषित करा दिया। नतीजा यह हुआ कि 
राज्य शासन के स्कूल शिक्षा विभाग से मिले निर्देशों के बाद जिला प्रशासन ने जिले की शासकीय एवं अशासकीय शालाओं के कक्षा पांचवीं तक के बच्चों के लिए १५ अप्रैल से अवकाश की घोषणा संबंधी आदेश को स्थगित कर दिया। जिला प्रशासन के मुताबिक जिले की शासकीय एवं अशासकीय स्कूलों की सभी कक्षायें पूर्व निर्धारित शैक्षणिक कैलेण्डर के अनुसार ही लगेंगी। शासकीय स्कूलों में ग्रीष्म कालीन अवकाश भी स्कूल शिक्षा विभाग के निर्धारित कैलेण्डर के मुताबिक ही रहेंगे। यहां गौरतलब है कि पहले शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने शासन को प्रस्ताव भेजे बगैर कलेक्टर से  अवकाश घोषित करवाने की गलती कर दी। जब यह मामला सोशल मीडिया पर स्कूल में अवकाश की सूचना जारी करते हुये कलेक्टर का वीडियो वायरल हुआ तब शासन तक यह बात गई और इस बात का खुलासा हुआ कि तत्कालीन भाजपा सरकार में ही स्कूल में अवकाश संबंधी सारे अधिकार शासन स्तर पर लिये जायेंगे। लिहाजा शिक्षा विभाग के नौकरशाहों को चाहिये था कि अवकाश संबंधी एक प्रस्ताव कलेक्टर के माध्यम से आयुक्त लोक शिक्षण संचालनालय को भिजवाया जाता है। सोशल मीडिया पर १५ अप्रैल से स्कूलों में अवकाश घोषित करने की खबर को शिक्षा विभाग ने कलेक्टर के बयान का वीडियो पोस्ट कर दिया लेकिन कलेक्टर छवि भारद्वाज ने आदेश जारी करने की घोषणा की लेकिन इसके पहले ही उनका वीडियो भोपाल तक जा पहुंचा और भोपाल से आदेश हुये कि जिला स्तर पर अवकाश के निर्णय नहीं लिये जा सकते। 
बिगड़ रही बच्चों की सेहत .........
इन दिनों पारा लगातार ४० डिग्री पर बना हुआ है खासकर मासूम बच्चे हीट स्ट्रोक का शिकार हो रहे हैं। धूप में स्कूल के गेट में खड़े होकर अभिभावक या वाहनों का इंतजार करने वाले बच्चे गश खाकर गिर रहे हैं। बच्चों को उलटियां हो रहीं हैं और सरकार नियम, कायदे, कानूनों में उलछी हुई है। पहले जिला कलेक्टरों को गर्मी, बारिश और ठण्ड तीनों ऋतुओं में स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर स्कूलों में अवकाश देने का अधिकार दिया गया था लेकिन पिछले तीन सालों से यह आदेश शासन ने वापस ले लिया। इसका नतीजा है कि कलेक्टर की घोषणा के बाद शासन से आदेश आया कि शैक्षणिक वैâलेण्डर के अनुसार ही कक्षायें लगेंगी। 
अप्रैल में स्कूल लगाने का औचित्य क्या ......
विछले कुछ वर्षों से मार्च महीने के अंत से ही तजे गर्मी पड़ने लगती है और अप्रैल आते-आते पारा सिर चढ़ जाता है। १ अप्रैल से ३० अप्रैल तक स्कूल लगाने की कोशिश की जाती है। बच्चे गर्मी से बीमार पड़ने लगते हैं तो कक्षा २० अप्रैल तक कर दी जाती है फिर अखबारों में बच्चों के बीमार होने की खबर सर्खियां बनने लगतीं हैं तब शासन-प्रशासन मसीहा बनकर सामने आते हैं। फिर १५ से २० अप्रैल के मध्य छुट्टियां घोषित की जातीं हैं। ङइधर अप्रैल में चार पाँच छुट्टी भी हर साल होती हैं, यानी कुल मिलाकर १०-१५ दिन कक्षायें लगाकर नूरा कुश्ती का अंत हो जाता है। 
अभिभावक भी रहते हैंं मुश्किल में .......
इधर मार्च अंत में आयकर कटोती के कारण मार्च का वेतन भी आधा-अधूरा मिलता है और अप्रैल का वेतन नये वित्त वर्ष के प्रारंभ होने से १० से १५ अप्रैल तक मिलता है। नये सत्र की किताबें, कापियां, बस्ता बॉटल आदि मिलाकर कुछ १० से १५ हजार एक बच्चे के नाम पर बच्चे के अभिभावक को लगता है। 
फिर ये ड्रामा क्यों ...?...
जागरूक अभिभावक स्वयं बच्चों को गर्मी में पढ़ाते भी है और अन्य गतिविधियों में उन्हे सीखने सिखाने के लिए भेजते ही है तब फिर ये ड्रामा क्यूँ खोला जाता है। पहले शिक्षण सत्र जुलाई से प्रारंभ होता था। पूरे ३ महीने अप्रैल, मई, जून अवकाश रहता था। अब नये सिस्टम के मुताबिक १५ जून से शिक्षण सत्र प्रारंभ करने का तमाशा किया जाता है। जब मानसून सिर पर आ जाता है। मध्यप्रदेश में मानसूनी बारिश का औसतन आने का समय २० जून है और कई वर्षों से ये जुलाई के प्रथम सप्ताह तक ही आती है तो स्कूल जल्दी चालू कर क्या संदेश देना चाहते हैं। 
क्या १ जुलाई से स्कूल खुलेंगे तो बच्चे अशिक्षित रह जायेंगे ........
स्कूल एक अप्रैल से खुले या एक जुलाई से बिना ट्युशन, कोचिंग के पढ़ाई पूरी नहीं हो पाती फिर स्कूलों को लूटने का मौका खुद सरकार दे रही है।