रायपुर। दंतेवाड़ा में भाजपा विधायक भीमा मंडावी की हत्या के बाद बस्तर में नक्सली हिंसा के जख्म फिर हरे हो गए हैं। प्रदेश में चार महीने पहले हुए चुनावों में कांग्रेस की सरकार बनी तो नक्सल मामले में नीति बदलने की सुगबुगाहट शुरू हुई जो किसी नतीजे पर नहीं पहुंची। कांग्रेस ने वादा किया था कि जीते तो बातचीत के जरिए नक्सल समस्या का हल निकालेंगे लेकिन सरकार बनने के बाद इस दिशा में सरकार की ओर से कोई पहल नहीं की गई।
इधर सरकार बदलने के बाद फोर्स असमंजस में है। जवानों को समझ नहीं आ रहा है कि सरकार की क्या नीति क्या होगी। जंगल में नक्सल विरोधी ऑपरेशन लगभग बंद है जिससे नक्सलियों को बाहर निकलकर वारदात करने का मौका मिल गया है।
फोर्स के अफसर कहते हैं कि सरकार की नीति स्पष्ट होनी चाहिए। या तो युद्धविराम की दोतरफा घोषणा हो या फिर लड़ाई की जाए। तय तो हो कि करना क्या है। प्रदेश में सरकार बदली तो शुरू में नक्सल नीति साफ नहीं की गई और जवान ऑपरेशन करते रहे। दोरनापाल और भैरमगढ़ में दो मुठभेड़ ऐसी सामने आई जिन्हें फर्जी बताया गया। इसके बाद फोर्स शांत हो गई और नक्सलियों को मौका मिल गया। अब तो नक्सली सरेआम मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पर आरोप लगा रहे है।
बस्तर में नक्सल समस्या चार दशक पुरानी है। बीते वर्षों में यहां 12 हजार से ज्यादा जवान और आम नागरिक इस हिंसा का शिकार हो चुके हैं। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद लगातार 15 वर्षों तक यहां भाजपा का शासन रहा। नक्सल मामले में भाजपा की नीति की कांग्रेस सदैव आलोचना करती रही। हालांकि नक्सलियों के विरोध में चले आंदोलनों में कांग्रेस और भाजपा दोनों ने मिलकर आवाज उठाई।

भाजपा की सरकार ने नक्सल समस्या से निपटने के लिए सलवा जुड़ूम से लेकर ऑपरेशन ग्रीन हंट और प्रहार तक चलाया। 2005 में दक्षिण बस्तर के आदिवासी नक्सलियों के खिलाफ खड़े हो गए। बीजापुर, दंतेवाड़ा और सुकमा जिलों के सात सौ से ज्यादा गांवों को सलवा जुड़ूम अभियान के तहत जंगल से बाहर पुलिस कैंपों के निकट लाया गया।
सलवा जुड़ूम अभियान को तत्कालीन भाजपा सरकार ने सपोर्ट किया जबकि इस अभियान की कमान कांग्रेस के दिग्गज नेता और तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा के हाथ रही। 2013 के विधानसभा चुनाव के पहले नक्सलियों ने कर्मा समेत कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं की हत्या कर दी।

2011 में सुप्रीम कोटे ने सलवा जुड़ूम को अवैध करार दिया। इससे पहले ही फोर्स वहां ऑपरेशन ग्रीन हंट शुरू कर चुकी थ।सलवा जुड़ूम और ग्रीन हंट में मानवाधिकारों के हनन के अनेक आरोप लगे। इस दौरान विपक्ष में रही कांग्रेस भी सरकार पर हमलावर रही। अब सरकार बदली है तो असमंजस की स्थिति बन गई है।
बातचीत पर नहीं बनी बात

कांग्रेस ने बातचीत का वादा किया था लेकिन सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री ने कहा कि हम पीड़ित पक्षों से बात करेंगे न कि नक्सलियों से। इसके बाद नक्सलियों की ओर से बयान आया कि सरकार माहौल बनाए तो बातचीत हो सकती है। इसके जवाब में मुख्यमंत्री ने कहा कि नक्सली हथियार छोड़ें और संविधान पर भरोसा करें। फिर नक्सलियों ने कह दिया कि हम न हथियार छोड़ेंगे न बातचीत करेंगे। यहीं से बात बिगड़ गई।
चुनाव आते ही तेवर बदले

लोकसभा चुनाव आते ही नक्सलियों ने तेवर साफ कर दिया। उन्हांेने राज्य की कांग्रेस सरकार पर पूर्ववर्ती भाजपा सरकार की तर्ज पर फर्जी मुठभेड़ कराने का आरोप लगाया। मुख्यमंत्री के खिलाफ पर्चे फेंके गए। चुनाव आते ही लगातार हमले कर अपनी नीयत स्पष्ट कर दी। अब चुनाव के दौरान सुरक्षा को लेकर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।

राजनीति में उलझी नक्सल नीति

बस्तर में चुनाव आते ही एक बार फिर नक्सलियों को लेकर राजनीति शुरू हो गई है। एक बार फिर भाजपा नक्सल समर्थक बताकर कांग्रेस को घेरने में जुटी है जबकि कांग्रेस याद दिला रही है कि भाजपा के शासन में झीरम कांड हुआ था और भाजपा ने इसकी सीबीआई जांच नहीं कराई थी।

कांग्रेस नेता राजबब्बर ने विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान नक्सलियों को क्रांतिकारी बताकर विवाद खड़ा कर दिया था। सरकार ने जेलों में नक्सल और अन्य अपराध में बंद आदिवासियों के मामलों की समीक्षा के लिए जस्टिस पटनायक की अध्यक्षता में कमेटी गठित की तो उसपर भी दोनों दलों में बयानबाजी हुई।