तहसील मुख्यालय से दस किमी दूर सकलनारायण की पहाड़ी पर गुफा के अंदर श्रीकृष्ण की प्रतिमा स्थापित है। गुड़ी परवा के दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच भगवान श्रीकृष्ण की पूजा अर्चना करते हैं। यहां रखे कुछ अंश बताते हैं कि रामायण और महाभारत काल के कुछ रहस्य छुपे हुए हैं। गुफा के अंदर बहुत सारी सुरंगें हैं। इन सुरंगों में भगवान विराजे हुए हैं।

एक दस मीटर की सुरंग है, जहां गोपिकाओं की मूर्तियां विराजी हुई हैं। भक्त यहां भी घुटनों के बल जाकर दर्शन कर लौटते हैं। रुद्राराम नेशनल हाइवे से आठ किमी दूर घने जंगल में छुपी पहाड़ी में गुफा है। गुफा तक पहुंचने के लिए कोई रास्ता नहीं है।
हिंदू नववर्ष के दिन आयोजक समिति द्वारा जंगलों से पगडण्डी रास्ते को साफ कर रास्ता निकाला जाता है, तब जाकर वह भक्त दर्शन के लिए पहुंचते है। जंगल भयानक होने की वजह से जंगली जानवरों का खतरा रहता है बाकी दिन यहां कोई नहीं जाता है।

गुफा के अंदर अंधेरा छाया रहता है। श्रद्धालु अंदर जाने के लिए टार्च लेकर आते हैं। रास्ता सकरा व छोटा है। भक्त घुटनों के बल अंदर प्रवेश करते है। गुफा के आस-पास सैकड़ों मधुमक्खियों की छत्ते लगी हुई हैं। पहाड़ी के आसपास गांव के पुजारी व ग्रामीण इस दर्शन की पूरी व्यवस्था करते है।
समिति द्वारा कार्यक्रम पांच दिन का किया जाता है व कृष्ण भगवान की शादी राधा संग रचाई जाती है। दोनों मूर्तियों का आपस में विवाह किया जाता है। श्रीकृष्ण की इतनी भक्ति होती है कि यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते है।

गुफा के अंदर है मेकल दोड्ड 
गुफा के अंदर जानवरों का तबेला जैसा बना हुआ है। इस कोठे को मेकल दोड्डी के नाम से जाना जाता है। बताया जाता है की इस दोड्डी में बकरियों का खाद जमा होता है जिसे दर्शन के लिए गए भक्त थोड़ा-थोड़ा कर लेकर आते हैं। यह खाद कभी खत्म नहीं होता। ऐसा भी नहीं कि यहां कोई बकरियां रहती हैं। पुराने बुजुर्ग बताते हैं कि भगवान कृष्ण का चमत्कार है कि यहां ऐसे ही खाद जमा होता है। ग्रामीणों का मानना है कि यह खाद झाड़ फूंक के काम में आता है।