जांजगीर। छत्तीसगढ़ के जांजगीर में भीमा तालाब के पास 12 वीं शताब्दी में निर्मित विष्णु मंदिर उपेक्षा का शिकार है। यहां पर्यटक दूर दूर से मंदिर को देखने आते हैं। कल्चुरी काल मे जाज्वलयदेव प्रथम द्वारा निर्मित यह मंदिर स्थापत्य कला का बेहतर नमूना है। यहां मूर्तियों की बेहतर नक्कासी देखने को मिलती है। मगर पुरातत्व विभाग की उपेक्षा के चलते मंदिर की मूर्तियों का क्षरण हो रहा है। मंदिर की सुरक्षा के नाम पर महज एक चौकीदार है, जो सुबह मन्दिर का गेट खोलता है और शाम को बंद कर देता है। हालांकि यह मंदिर अधूरा है इसमें गुम्बद नहीं है और न ही यहां मूर्तिस्थापित है।

राजा जाज्वल्य देव ने कराया था निर्मांण

छत्तीसगढ़ के इस दक्षिण कोशल क्षेत्र में कल्चुरी नरेश जाज्वल्य देव प्रथम ने भीमा तालाब के किनारे 12वीं शताब्दी में इस मंदिर का निर्माण करवाया था। मंदिर पूर्वाभिमुखी है और सप्तरथ योजना से बना हुआ है। गर्भगृह के दोनो ओर दो कलात्मक स्तंभ हैं जिन्हें देखकर यह आभास होता है कि पुराने समय में मंदिर के सामने महामंडप निर्मित था।

परन्तु कालांतर में नहीं रहा। मंदिर का निर्माण एक ऊंची जगती पर हुआ है। मंदिर के चारों ओर बेहद सुंदर प्रतिमाओं का अंकन है, जिससे तत्कालीन मूर्तिकला के विकास का पता चलता है। गर्भगृह के प्रवेश द्वार के दोनो ओर देवी गंगा और जमुना के साथ द्वारपाल जय-विजय स्थित हैं।

इसके अतिरिक्त त्रिमूर्ति के रूप में ब्रह्मा, विष्णु और महेश की मूर्ति है। ठीक इसके ऊपर गरुणासीन भगवान विष्णु की मूर्ति स्थित है। मंदिर की जगती के दोनों फलक में अलग-अलग दृश्य अंकित हैं।

दीवारों पर जड़ी हैं मंदिर की मूर्तियां

करीब 900 साल पुराने इस मंदिर की ज्यादातर मूर्तियां दीवार पर जड़ी हुई हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि किसी समय में बिजली गिरने से मंदिर ध्वस्त हो गया था, जिससे मूर्तियां बिखर गईं। उन मूर्तियों को मंदिर की मरम्मत करते समय दीवारों पर जड़ दिया गया।

यहां रामायण के 10 से 15 दृश्यों का अंकन देखने को मिलता है। इतनी सजावट के बावजूद मंदिर के गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं है। यह मंदिर सूना है और एक दीप के लिए तरस रहा है।