नई दिल्ली,  भारत में सवर्णों ने जो धारदार आंदोलन चलाए हैं, उनमें आरक्षण के खिलाफ किया गया आंदोलन आज भी याद किया जाता है. ऐसा भी कहा जाता है कि इस आंदोलन ने उनको उनकी शक्ति का एहसास भी कराया. वीपी सिंह ने जब मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू की थीं तब इसके खिलाफ कई युवाओं ने जान तक दे दी थी.

आंदोलनकारियों का तर्क होता था कि नौकरियां मेरिट के आधार पर मिलनी चाहिए. आरक्षण के तहत चुना गया डॉक्टर या इंजीनियर एक मेरिट वाले के सामने कहां टिकेगा? किसी भी तरह का आरक्षण मेरिट वालों के साथ अन्याय है. दूसरा तर्क होता था कि आरक्षण का आधार आर्थिक होना चाहिए. इसके बाद गरीब सवर्णों के लिए भी आरक्षण की मांग की जाने लगी.

सामान्य वर्ग के लिए आरक्षण बिल संबंधी संविधान संशोधन लोकसभा में पास हो गया है. अब सवाल उठता है कि क्या सवर्णों का आरक्षण को लेकर विरोध शांत हो जाएगा? क्या अब यह सवाल नहीं उठेंगे कि किसी भी तरह का आरक्षण मेरिट के साथ समझौता है. क्या इस 10 फीसदी आरक्षण का लाभ लेने वाले लोग बिना आरक्षण के सफलता पाने वालों से कम योग्य नहीं होंगे? कोटा को भीख कहने वाले लोग क्या अब भी अपनी बातों पर कायम रहेंगे? क्या अब हर तरह का आरक्षण खत्म करने की बात नहीं होगी? क्या मोदी सरकार सामान्य वर्ग के लोगों को आरक्षण का वास्तव में लाभ देना चाहती है या यह एक झुनझुना है.

कहां से दिया जाएगा सवर्ण आरक्षण

बिल के मुताबिक सामान्य वर्ग को 10 फीसदी आरक्षण अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए मिलने वाले रिजर्वेशन में से नहीं होगा. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने लोकसभा में इसे साफ करते हुए बताया कि सामान्य वर्ग को 10 फीसदी आरक्षण से सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित आरक्षण की 50 फीसदी सीमा का उल्लंघन नहीं होगा. जेटली ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने 50 फीसदी की जो सीमा निर्धारित की है वह केवल सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ों के लिए है. इसके पीछे तर्क था कि सामान्य वर्ग के लिए कम से कम 50 फीसदी सीटें तो छोड़ी जाएं वरना एक वर्ग को उबारने के लिए दूसरे वर्ग के साथ भेदभाव हो जाता. इस लिहाज से मौजूदा बिल सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के पीछे की भावना के खिलाफ नहीं है. यानी यह जो रिजर्वेशन दिया जाएगा, उसी 50 फीसदी में से दिया जाएगा जिसमें सामान्य वर्ग के सदस्य फाइट करते रहे हैं या जो सभी के लिए खुला होता है.

आरक्षण के खिलाफ बोलने वाले कहां हैं?

तो क्या मोदी सरकार ने अपने इस मास्टर स्ट्रोक से आरक्षण के खिलाफ बोलने वालों को निरुत्तर कर दिया है? सवर्णों का एक बड़ा तबका रिजर्वेशन के खिलाफ बोलता रहा है. मंडल आयोग की सिफारिशों को जब पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने लागू किया तो देशभर में प्रदर्शनों का दौर शुरू हो गया. खुदकुशी की घटनाएं सामने आईं. बाद के दिनों में यूथ फॉर इक्वलिटी जैसा संगठन खड़ा हो गया. यह संगठन हमेशा जाति आधारित रिजर्वेशन का विरोध करता रहा है, चाहे वह मंडल कमीशन हो या पदोन्नति में आरक्षण का मसला हो.

समर्थन लेकिन 50 फीसदी में शामिल हो यह आरक्षण

अब यूथ फॉर इक्वलिटी मोदी सरकार के इस 10 फीसदी आरक्षण के बिल का समर्थन कर रहा है. यूथ फॉर इक्वलिटी के सेक्रेटरी डॉ. अरुण कुमार ने 'आजतक' के एक कार्यक्रम में इसे ऐतिहासिक और साहसिक कदम बताया. उन्होंने कहा कि अब तक आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात नहीं होती थी. संविधान में भी सामाजिक और आर्थिक पिछड़ा वर्ग लिखा हुआ है. कहीं जाति का जिक्र नहीं है. लेकिन अभी तक जातीय स्तर पर आरक्षण जारी है. आरक्षण की 10 साल पर समीक्षा की बात कही गई थी, लेकिन यह नहीं हुआ. अगर 70 साल बाद आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की वकालत की जा रही है तो यह सराहनीय कदम है. हालांकि वह कहते हैं कि यदि आरक्षण अनारक्षित हिस्से से जाता है तो यूथ फॉर इक्वलिटी इसका विरोध करेगा.

यूथ फॉर इक्वलिटी के प्रेसिडेंट डॉ. कौशलकांत मिश्रा ने भी aajtak.in से कहा कि यदि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में जाता है तो कोर्ट इसे स्क्रूटनी के लिए भेजेगा. उस दौरान उनका संगठन इस सवर्ण आरक्षण को अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए निर्धारित आरक्षण में समाहित करने की मांग करेगा और इसके लिए याचिका दायर करेगा.

आरएसएस के सुर भी बदले

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को आरक्षण विरोधी माना जाता है. बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण की समीक्षा की बात कही थी. लेकिन संघ विचारक संगीत रागी ने 'आजतक' से बात करते हुए सामान्य वर्ग के लिए आरक्षण दिए जाने का समर्थन किया. वह पिछले 70 सालों में गरीब सवर्णों को रिजर्वेशन नहीं दिए जाने के लिए कांग्रेस को कोसते हैं. वह कहते हैं कि अलबत्ता 1991 में पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार ने सामान्य वर्ग के गरीबों को आरक्षण देने की कवायद की, लेकिन वह पहल ठोस रूप नहीं ले पाई.

संगीत रागी कहते हैं कि अन्य पिछड़ा वर्ग में कोई एक जाति नहीं है और न ही अनुसूचित जाति में कोई एक खास जाति है. इसी तरह सामान्य वर्ग भी होमोजेनाइज नहीं है. सामान्य वर्ग में भी कई ऐसे अपर कास्ट हैं जो अति दलितों से भी बहुत गरीब हैं. उनकी चिंता कौन करेगा? क्या उनका सिर्फ यही दंड है कि वो इस देश में अपर कास्ट में पैदा हुए हैं, उनकी पीढ़ियों ने ऐसा किया होगा जिसका दंड उन्हें भुगतना पड़ रहा है. 10 फीसदी आरक्षण को वह गरीबों को मुख्य धारा में लाने की कवायद मानते हैं.

60 फीसदी आरक्षण के बाद क्या मेरिट को और नुकसान होगा?

मोदी सरकार के इस कदम को सराहनीय बताने वाला यूथ फॉर इक्वलिटी भी अब मेरिट की बात नहीं कर रहा है. अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग के आरक्षण को बैसाखी कहने वाला वर्ग भी उसी बैसाखी की सवारी करने को तैयार है. लेकिन सवाल तो मौजू है कि अब क्या मेरिट का दायरा सिमट जाएगा? क्या मेरिट की लड़ाई 60 फीसदी बनाम 40 फीसदी होगी? इस सवाल को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता कि अगर नया बिल कानून बन जाता है तो क्या वास्तव में सामान्य वर्ग के साथ इंसाफ होगा या यह सिर्फ झुनझुना बनकर रह जाएगा? क्योंकि अरुण जेटली के मुताबिक यह 10 प्रतिशत का कोटा भी सामान्य वर्ग के हिस्से से ही जाना है.