वर्तमान युग सुविधावादी युग है। प्राचीन युग में जो साधन-सामग्री राजा-महाराजाओं के लिए सुलभ थी, वर्तमान में जन-साधारण के लिए उपलब्ध है। फिर भी हर व्यक्ति तनावग्रस्त दिखाई दे रहा है। हर व्यक्ति पहले से कहीं अधिक परेशान तो है ही, पहले से कहीं ज्यादा चिंताएं उसे चहुंओर घेरे हुए हैं। उसके समक्ष विविध प्रकार की समस्याएं और प्रतिकूलताएं हैं।

हालांकि जीवन के साथ कठिनाइयों का अटूट संबंध होता है। जहां जीवन है, वहां समस्याएं और कठिनाइयां हैं। समस्याएं और कठिनाइयां ही तो जीवन के होने का सबूत होती हैं। उनका समाधान और प्रतिकार सशक्त विचार, आंतरिक बल और साहस से ही हो सकता है। जो परिस्थितिवादी होता है, वह स्वयं के सुधार और बदलाव पर ध्यान न देकर सिर्फ आर्थिक, भौतिक एवं सामाजिक परिस्थितियों को बदलने का चिंतन करता है। रॉबर्ट एच. शुलर ने कभी कहा था, ‘किसी को पैसे की समस्या नहीं है। लोगों को बस विचारों की समस्या होती है। इसलिए जब तक आपके पास सही विचार हैं, पैसे की कभी समस्या नहीं होगी।’ आत्मविश्वास की ज्योति प्रज्जवलित करने से ही विकास का मार्ग प्रशस्त हो सकता है, समाधान की दिशा प्राप्त हो सकती है।
व्यक्ति और परिस्थिति का गहरा संबंध है। जिसे अनुकूल परिस्थितियां प्राप्त होती हैं, वह सहजता से विकास कर सकता है। प्रतिकूल परिवेश में सफलता कठिन होती है। जिसका आत्मबल प्रबल होता है, वह प्रतिकूल परिस्थितियों को भी अनुकूलता में बदल सकता है। उसके अभाव में सौभाग्य से प्राप्त अवसर भी अभिशाप बन जाते हैं। इतिहास के पृष्ठों पर ऐसे अगणित उदाहरण अंकित हैं। परिस्थिति की अपेक्षा हमें मनःस्थिति और आत्मशक्ति की ओर अधिक ध्यान देना चाहिए। जैसा कि टेनीसन ने कहा था, ‘मेरे मित्रो! आओ, एक नई दुनिया बसाने के लिए कभी देर नहीं होती।’ इसलिए चलिए, कुछ बड़ा सोचें और एक ऐसी दुनिया बसाएं, जिसके बारे में हमसे पहले किसी ने सपना भी न देखा हो।

लेकिन इसके लिए दीनता और हीनता की ग्रंथियां बड़ी बाधाएं हैं। उसे तोड़े बिना विकास का कोई भी सपना साकार नहीं हो सकता। जिस प्रकार अभिमान करना पाप है, बंधन है, उसी प्रकार स्वयं को दीन-हीन समझना भी पाप है, बंधन है। किसी भी प्रकार की विषमता और विसंगति का अनुभव जीवन के लिए हानिकारक और बंधनकारक है। आधुनिक मनोविज्ञान में महत्ता की ग्रंथि यानी सुपिरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स व हीनता की ग्रंथि यानी इनफिरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स पर बहुत अनुसंधान हुआ है। जीवन की प्रगति व सफलता के लिए इन दोनों ग्रंथियों से मुक्ति प्राप्त करना जरूरी है।
कतिपय धर्मगुरु, शिक्षक, अभिभावक अपमानजनक और हीनता सूचक भाषा का उपयोग करते हैं। यह उचित नहीं है। इससे मस्तिष्क में हीनता के संस्कार अंकित हो जाते हैं, जिनका भविष्य में घातक प्रभाव दिखता है। जिन पर हम अनुशासन करते हैं, उनके लिए मार्गदर्शन जरूरी है, पर उनका आत्मविश्वास और आत्मसम्मान खंडित न हो, यह ध्यान रखना भी आवश्यक है। हीनता और भीरुता की भावना को प्रोत्साहन नहीं मिलना चाहिए। जहां भक्ति और समर्पण के साथ आत्मशक्ति का आधार सबल होता है, वहीं जीवन की धारा संतुलित और व्यवस्थित होती है।