ओशो
इच्छाओं को त्यागना तब तक कठिन है जब तक आप जागृत नहीं होते। जब आप सुप्त अवस्था में होते हैं तो इच्छाओं का जगना एक प्राकृतिक घटना है। इच्छा एक स्वप्न के अलावा कुछ और नहीं है। जब आप जागते हैं तो स्वप्न गायब हो जाते हैं। आपको इच्छाओं के खिलाफ नहीं, बल्कि अपनी नींद के खिलाफ लड़ना है। यह आपकी जड़ काट रही है। अगर आप अचेत अवस्था में काम करेंगे तो भले आप कुछ भी करें परिणाम वही रहेगा जो व्यक्ति जागृत अवस्था में है, वह जानता है कि जाने के लिए कोई स्थान नहीं है और ना ही कुछ बनने के लिए।
वास्तव में इच्छाओं को त्यागने का विचार भी एक दूसरी इच्छा ही है। उन्होंने एक जागृत मनुष्य गौतम बुद्ध से सुना कि अगर आप इच्छाओं को त्यागते हैं तो आपको शांति मिलेगी, अगर आप इच्छाओं को दूर कर देते हैं तो आपको आनंद मिलेगा जो अनंतकाल तक रहेगा। इसके बाद आप ना जन्म के बारे में सोचेंगे और ना ही मृत्यु के बारे में। लाखों लोग लालची बन गए और इच्छाओं को त्यागने के बारे में सोचने लगे ताकि उन्हें अनंतकाल तक आनंद की प्राप्ति होती रहे। क्या यह नई इच्छा नहीं है जो आपके अंदर जन्म ले रही है? भक्ति की इच्छा, मुक्ति की इच्छा, इच्छाहीन होने की इच्छा, ये सब भी इच्छा का ही एक रूप है। आपके अंदर एक नई इच्छा यानी धार्मिक इच्छा ने जगह ले ली है।
ओशो बताते हैं कि हमें हमारी सुसुप्तावस्था से जागने की आवश्यकता क्यों है। दरअसल, जब आप इच्छाओं से भरे होते हैं तो आपके दुखों में वृद्धि हो जाती है। यह बिल्कुल वैसे ही है जैसे बारिश के बाद घास बढ़ जाती हैं। लेकिन अगर आप अपनी इच्छा को अपने वश में कर लेते हैं, तो आपके दुख कम हो जाएंगे। एक अच्छी सलाह जो सभी लोगों के लिए है।

गौतम बुद्ध, धम्मपद: जैसे नई जड़ों के लिए घास का सफाया कर दिया जाता है, वैसे ही अपनी इच्छाओं को खत्म करें। यदि ऐसा नहीं किया, तो मौत आपको वैसे ही तबाह करेगी जैसे एक नदी असहाय गन्नों को तबाह करती है। अगर खेत में जड़ की पकड़ मजबूत हो, तो एक गिराया हुआ पेड़ फिर से खड़ा हो जाता है। उसी तरह अगर इच्छाओं को जड़ से नहीं उखाड़ा गया, तो आपके अंदर फिर से दुख की जड़ें मजबूत हो जाएंगी।