प्रथम स्तर में मनुष्य जब पांचभौतिक जगत से मन को हटाता है, उस अवस्था में पूर्ण रूप से न सही, आंशिक रूप से पांचभौतिक जगत पर मनुष्य का आधिपत्य हो जाता है। इस अवस्था में मनुष्य किसी हद तक जगत का कल्याण कर सकता है। अगर कोई न करे या करने में असमर्थ हो तो समझना होगा कि उसकी मानसिकता में कहीं न कहीं त्रुटि रह गई है।
द्वितीय स्तर में मनुष्य जब अपने को अहं तत्व में समाहित करना आरंभ करता है, उस अवस्था में उसे समझना उचित है कि प्रत्येक जीव-जंतु, तरु, लता, वृक्ष, स्थावर, जंगम व जड़, चेतन सब कुछ को आंतरिक रूप से जान गया है। जब सब कुछ उसका विषयी हो जाएगा तभी वह सभी के विषय में सोच सकेगा, सभी की सेवा कर सकेगा, सभी के साथ उसका आत्मिक संबध स्थापित होगा। अगर ऐसा न हो तो कोई चाहे चौबीस घंटे में बीस घंटा ध्यान-धारणा करे, मैं तो कहूंगा, उसकी साधना पथ में कोई त्रुटि है। उसका मार्ग नव्यमानवतावाद का नहीं है। वह मनुष्य किसी भी काल में जगत की, समाज की, मूल्यवान संपत्ति के रूप में परिणत नहीं होगा।
तृतीय स्तर है- मैं कर रहा हूं, मैं देख रहा हूं, मेरे द्वारा ही यह हुआ है, वह हुआ है। यह जो अहं मिश्रित भावना है, जब इस भावना की परिसमाप्ति हो जाती है, साधना की शेष तथा चरम स्थिति में जब इस प्रकार की चित्त शुद्धि हो जाती है तभी वह प्राणों के आंतरिक माधुर्य को अनुभव कर सकेगा।

अर्थात प्रत्येक मनुष्य को अपना प्राण जितना प्रिय होता है, सभी जड़, चेतन व अन्य प्राणियों को भी प्राण उतना ही प्रिय होता है, इस सत्य को जो समझता है उसे ही साधु कहा जाता है। साधना जगत के इस उच्च स्तर पर पहुंचने के बाद मनुष्य प्रत्येक सत्ता को अपना समझेगा। वह सभी जीव की सेवा करेगा तथा प्रत्येक जीव के सुख-दुख को अनुभव कर उनकी उन्नति के लिए प्रयासशील होगा। जहां ऐसा कुछ न हो, वहां समझना होगा कि वह जिस पथ पर चल रहा है, वह नव्यमानवतावाद का पथ नहीं है।
मनुष्य जब अपने लक्ष्य तक पहुंचता है तब वह परमपुरुष के साथ मिलकर एक हो जाता है, तब उस समय उसके मन में द्वैत बोध नहीं रह जाता। वह सभी को अपने भीतर अनुभव करता है। उसे अनुभव होता है कि सब कुछ उसके भीतर से निकला हुआ है। सब कुछ उसमें स्थित हैं और अंत में सभी उसमें ही लीन हो जाएंगे।

इसलिए उसके मन में किसी के भी प्रति विद्वेष भावना नहीं रह जाती है, नहीं रह सकती। वह सभी का प्रिय है, सभी उसके अपने हैं और सभी के लिए वह कार्य करेगा। अगर ऐसा न हो तो समझना होगा कि उसका पथ त्रुटिपूर्ण है। वह सिद्ध महापुरुष नहीं है। अगर वह सिद्ध महापुरुष है तो सभी कुछ के लिए अर्थात सृष्ट जगत की प्रत्येक सत्ता के कल्याण के लिए वह प्रयासरत रहेगा। अगर ऐसा नहीं होता है तो मैं कहूंगा कि उसका पथ नव्यमानवतावाद का नहीं है। लक्ष्य तक पहुंचने से पहले मनुष्य को नव्यमानवतावाद के पथ पर चलना ही होगा। यही सही है और साधना मार्ग की यही पहली और अंतिम बात है।