मुसलमानों, यहूदियों और ईसाइयों के पितृ-पुरुष अब्राहम, जिन्हे मुसलिम इब्राहिम के नाम से संबोधित करते हैं, ने अपने जीवन में एक सिद्धांत बना रखा था कि किसी भूखे को भोजन खिलाए बिना वो स्वयं कभी भोजन ग्रहण नहीं करेंगे। इसलिए जब तक वह किसी को खाना खिला नहीं देते, तब तक स्वयं भोजन ग्रहण नहीं करते थे। एक बार ऐसा भी हुआ कि तीन दिनों तक कोई भूखा उनके पास नहीं आया। चौथे दिन अब्राहम ने देखा कि बूढ़ा और फटेहाल आदमी उनकी तरफ आ रहा है।उस आदमी को देखकर अब्राहम को काफी राहत मिली। जब वह आदमी उनके करीब आया तो अब्राहम ने हाथ-मुंह धोने के लिए पानी दिया और उसके आगे खाने की थाली रख दी। वह आदमी इतना भूखा था कि अब्राहम का शुक्रिया अदा किए बिना ही खाना खाने लगा। यह देखकर अब्राहम को काफी गुस्सा आया। उन्होंने भूखे आदमी के आगे से थाली खींच ली और कहा कि 'तुम कैसे आदमी हो कि शुक्रिया अदा किए बिना ही खाना खाने लगे।'
उसी समय आकाशवाणी हुई कि, ,ऐ अब्राहम क्या तुम्ही दुनिया को खाना खिलाते हो? इस आदमी की उम्र 80 साल है। इतने सालों में तुमने उसे महज एक वक्त का खाना खिलाया और खुद को खुदा समझ बैठे। मैने इसके लिए इतने सालों तक खाना जुटाया, लेकिन कभी नहीं कहा कि वह मेरा शुक्रिया अदा करे। जाओ, आज से तुम्हारी सारी तपस्या का फल अकारथ हो जाएगा।'

बस क्या था, अब्राहम ने अल्लाह के हुजूर में अपना अहंकार सौंप दिया। अंत में खुदा ने उनको माफ करते हुए कहा कि अब कभी यह मत समझना कि तुम्ही खाना खिलाते हो। अब्राहम को अपनी गलती का अहसास हुआ और अहंकार को उन्होंने अपने मन से निकाल कर फेंक दिया। सच ही कहा है कि ऊपरवाले को घमंड गवारा नहीं है, चाहे वह अपने सदगुणों को ही घमंड क्यों न हो।