मल्टीमीडिया डेस्क। राजा जनक के बारे में कहा जाता है कि वह अक्सर भोग-विलास में लिप्त रहते थे। एक बार राजा जनक सो रहे थे तभी उन्होंने सपना देखा कि शत्रु देश की प्रबल सेना ने उनकी राजधानी मिथिला पर आक्रमण कर दिया है। युद्ध में शत्रुसेना की विजय हुई और राजा जनक की पराजय। राजा जनक को बंदी बनाकर विजेता राजा के सामने पेश किया गया। विजयी राजा ने आदेश दिया कि-या तो राजा जनक बिलकुल नंगा होकर अपनी राजधानी के बीच से गुजरता हुआ अपने राज्य की सीमा से बाहर जाए, अन्यथा उसका वध कर दिया जाए।

प्रथम विकल्प को स्वीकार करते हुए राजा जनक बिल्कुल नग्न अवस्था में राजधानी से गुजरते हुए मिथिलापुरी से बाहर एक वृक्ष के नीचे खड़े होकर अपनी दुरावस्था पर विलाप करने लगे।
नींद में राजा को बैचेन देखकर रानी ने राजा को जगाया और उनकी इस बैचेनी का कारण पूछा। जनक हड़बड़ाकर उठे और उन्होंने रानी को अपना स्वप्न सुनाया। रानी बोली, 'राजन! जब तक आप स्वप्न में थे, तब तक स्वप्न की अयार्थवादी घटनाएं भी यर्थाथ प्रतीत हो रही थी। आंख खुलने पर आपको पता चला कि वे क्षणिक और अपघटित घटनाएं थी। स्वप्न में जिस प्रकार आप अपनी हीन अवस्था पर शोकाकुल हो रहे थे, कहीं जागृत अवस्था की भी आपकी हालत वैसी ही तो नहीं है। राजन जागृत अवस्था में आप जो कर रहे हैं वह सब भी स्वप्नवत यथार्थ ही है। पर इस बात का अहसास तब होगा जब आप सौ साल के जीवन की समाप्ति पर आत्म जागरण को प्राप्त होंगे।'

जनक ने सुना, स्वप्न और जागृति की इस भूल-भूलैया पर विचार किया, समझा और उसी क्षण से वे जनक से 'जनक विदेह' बन गए। भोगी से योगी बन गए।
राग और वितराग जीवन के दो पहलू होते हैं और यह दोनों एक साथ चलते रहते हैं। अगर इनके बीच सही समायोदन नहीं हो तो ये दुख का कारण बन जाते हैं। राजा जनक के साथ बी यही हो रहा था।