कई प्रकार के नशे हैं, जिन्हें मनुष्य अनेक माध्यमों से ग्रहण करता है। परंतु एक नशा है, जिसे किसी माध्यम की जरूरत नहीं होती। वह अपने आप बहुत ही सूक्ष्म रूप से हो जाता है और मनुष्य को पता भी नहीं चलता कि नशा चढ़ गया है। यह नशा है अभिमान का! किसी फिल्मी पंक्ति में कहा गया है- माटी के पुतले तुझे कितना गुमान है? है तो आखिर माटी का ही पुतला, परंतु अभिमानवश यह सोच कभी आती ही नहीं है। क्योंकि अभी तो यह पुतला बोलता है, चलता है, दुनिया के सारे काम करता है, परंतु अंतिम समय में जब पुनः माटी में मिलने की तैयारी हो जाती है, तब होश ठिकाने आ जाते हैं और सारा अभिमान चूर हो जाता है। फिर मनुष्य अपने बुरे कर्मों के लिए पश्चाताप करता है।
किसको नहीं हुआ है अभिमान? बड़े-बड़े राजाओं को हुआ, ऋषियों-मनीषियों को हुआ, साधारण इंसान को तो छोटी सी बात का भी अभिमान झट से हो जाता है। नशे की चीजों द्वारा किया गया नशा तो कुछ घंटों के बाद उतर जाता है, लेकिन अभिमान का नशा जल्दी नहीं उतरता। वह जिंदगी भर ऐसा चढ़ा रहता है कि अंतिम समय में ही उतरता है। लेकिन तब तक बहुत देर हो गई होती है और पछतावा ही शेष रहता है।
हिरण्यकश्यप और रावण जैसे दानव को अभिमान हुआ और इसकी परिणति अंतकाल में बुरी मृत्यु के रूप में हुई। महाभारत के संग्राम का कारण अभिमान था। आज बड़े-बड़े देशों में तनाव है- सिर्फ अभिमान के कारण! माया की चकाचौंध में मनुष्य भूल जाता है कि मैं क्या हूं? कौन हूं? अभिमान के नशे में चूर होकर अंधकार में भटक जाता है। हवा के झोंके से उड़ता हुआ कोई सूखा पत्ता यह गर्व करता है कि मैं उड़ रहा हूं, लेकिन ज्यों ही वह जमीन पर गिरता है तो उसे महसूस होता है कि मैं तो हवा के कारण उड़ रहा था और अब मैं अपने तने से भी अलग हो गया और आसमान से भी नीचे गिरा। इसी प्रकार मनुष्य की मनःस्थिति है कि अहंकार के नशे में वह भूल जाता है कि उसके पास अपना कोई बल नहीं है, बल्कि कोई अलग ऐसी चेतन शक्ति है जिसके कारण उसका अस्तित्व है।

कैसे टूटेगा अभिमान का नशा? जब जीते जी इस अभिमान से मुक्ति मिल जाए। अभिमान के नशे से छुटकारा पाना है तो सबसे पहले खुद ही यह निर्णय लेना होगा कि मैं अहंकार से बचूं। संत-महात्मा कहते हैं कि जीवन में ज्ञान का प्रकाश होना बहुत जरूरी है, उसी से अज्ञानता के अंधकार का नाश होगा। अहंकार रूपी चोर हमारे अंदर प्रवेश कर आनंद को चुरा रहा है। उजाला होने पर जैसे चोर भाग जाते हैं, वैसे ही मृत्यु का ज्ञान होते ही अहंकार रूपी चोर का पलायन हो जाएगा। हर पल इस ज्ञान का उजाला जितना बढ़ता जाएगा, अहंकार का भाव उसी अनुपात में घटता जाएगा। तभी हमें शांत और तनावहीन जीवन उपलब्ध हो सकेगा।किसी को भी यहां हमेशा नहीं रहना है, मनुष्य को सदैव इसका आभास रहना चाहिए। इसी से वैराग्य की भावना होगी कि भाई एक न एक दिन तो इस दुनिया से कूच कर जाना है। ज्ञान से, भक्ति से या वैराग्य से- जिन्होंने भी अहंकार के इस नशे को समाप्त कर दिया, उन्होंने ही सहज जीवन बिताया।