नवरात्र देवी दुर्गा का महापर्व माना जाता है। नवरात्र के नौ दिन इनके अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। इसके साथ ही सबसे पहले दिन लोग घरों में कलश स्थापना करते हैं जिसका अष्टमी व नवमी को विसर्जन किया जाता है। मान्यता है कि इस कार्य को पूरे विधि-विधान से करना चाहिए। इससे मां खुश होकर घर में सुख-समृद्धि का वरदान देती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते होंगे कि जैसे कलश स्थापना के ही जैसे कलश विसर्जन करते समय भी बहुत सी बातों का ध्यान रखना चाहिए। इस दौरान पूरे विधि-विधान का ध्यान रखना चाहिए, ताकि कोई भूल-चूक न हो और देवी दुर्गा रुष्ट न हों। आइए जानते कैसे करना चाहिए कलश विसर्जन- 
अष्टमी व नवमी के व्रत संपन्न होने के बाद हवन और फिर कन्याओं को भोजन ज़रूर करवाएं। अपनी हैसियत अनुसार कन्याओं को भेट दें। कन्याओं में से किसी एक कन्या को भगवती के नौ अवतारों का एकीकृत स्वरूप मानते हुए उनका विशिष्ट पूजन करें। कन्या पूजन के बाद, देवी भगवती का सपिरवार ध्यान करें। क्षमा याचना करें कि हे देवी, हम मंत्र, पूजा, विधान कुछ नहीं जानते। अपनी सामर्थ्यानुसार और अल्पज्ञान से हमने आपके व्रत रखे और कन्या पूजन किया। हे देवी, हमको, हमारे परिवार, कुल को अपना आशीर्वाद प्रदान करो। इस घर में सदैव विराजमान रहो। हमको सुख-समृद्धि, विद्या, बुद्धि, विवेक, धन, यश प्रदान करो। इसके बाद देवी सूक्तम का पाठ करते हुए यह मंत्र विशेष रूप से पढ़ें।
 

मंत्र- 
या देवि सर्वभूतेषु शांति रूपेण संस्थिता। 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:। 


इस मंत्र का लगातार 11 बार जाप करें। इसके बाद कलश विसर्जन के लिए ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥ 
ध्यान रहे कि कलश को उठाते हुए इस मंत्र जाप करते रहे। नारियल को अपने माथे पर लगाए और नारियल-चुनरी आदि अपनी मां, पत्नी, बहन की गोद में रखिए। इसके बाद कलश लेकर आम के पत्तों से कलश के जल को अपने घर के चारों कोनों पर छिड़किए। ध्यान रहे, सबसे पहले रसोई घर में छिड़कें, क्योंकि माना जाता है कि यहां लक्ष्मी जी का वास होता है। इसके बाद, अपने शयन कक्ष में, स्टडी रूम में, ड्राइंग रूम में और अंत में घर के प्रवेश द्वार पर छिड़किए लेकिन बाथरूम में जल न छिड़काएं। कलश के जल को तुलसी के गमले में अर्पण कर दें। जो सिक्का कलश में डाला हो, उसको अपनी तिज़ोरी में रख लें। उसको कभी खर्च न करें।
कलश और अखंड ज्योत के दीपक पर बंधे कलावे को अपने हाथ या बाजू पर बांध सकते हैं और गले में पहन सकते हैं। यह देवी का सिद्ध रक्षाकवच कहलाता है जो हर मुसीबत से रक्षा करता है। कवच सूत्र बांधते हुए जो भी देवी मंत्र याद हो, उसका उच्चारण करते रहे। यह सूत्र घर के सब सदस्य पहन सकते हैं। इस तरह नवरात्र व्रत का परायण संपन्न होता है। अष्टमी और नवमी से व्रत का परायण करने वाले इस विधि से कलश विसर्जन करेंगे तो उनको लाभ प्राप्त होगा। बता दें कि अष्टमी या नवमी तिथि को व्रत परायण करने वालों अखंड ज्योति को विजयदशमी के पूजन तक प्रज्जवलित रखना चाहिए। क्योंकि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विजयदशमी को भगवान राम ने अपराजिता देवी का पूजन किया था।