कोहिनूर हीरे को लेकर आम जनता के बीच काफी कौतूहल रहता है और लोग जानना चाहते हैं कि भारत का ये कीमती हीरा कैसे ब्रिटेन चला गया. इसी क्रम में जब एक सामाजिक कार्यकर्ता ने RTI के तहत पूछा कि क्या बेशकीमती हीरा अंग्रेजों को उपहार में दिया गया था या किन्हीं अन्य कारणों से इसे ब्रिटिश हुकूमत को दे दिया गया था. इसपर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने अपना जवाब दिया है.
जवाब में कहा गया है कि लाहौर के महाराजा ने करीब 170 वर्ष पहले इंग्लैंड की महारानी को 108 कैरेट का कोहिनूर समर्पित किया था न कि उन्हें सौंपा था. मतलब साफ है कि कोहिनूर को गिफ्ट नहीं किया गया बल्कि उसे लाहौर के महाराजा ने सरेंडर किया था. 
गौरतलब है कि ASI की तरफ से 10 अक्टूबर को दिया गया लिखित जवाब अप्रैल 2016 में केंद्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट को दिए गए जवाब से अलग है. सरकार ने कोर्ट में कहा था कि कोहिनूर की अनुमानित कीमत 20 करोड़ डॉलर से ज्यादा है जिसे न तो चुराया गया था, न ही अंग्रेज शासक उसे जबर्दस्ती ले गए थे बल्कि पंजाब के पूर्ववर्ती शासकों ने इसे ईस्ट इंडिया कंपनी को दे दिया था.
जवाब के मुताबिक, राष्ट्रीय अभिलेखागार में रखे रिकॉर्ड के से पता चला है कि लॉर्ड डलहौजी और महाराजा दिलीप सिंह के बीच 1849 में लाहौर संधि हुई थी जिसके तहत लाहौर के महाराजा ने कोहिनूर हीरा को इंग्लैंड की महारानी को समर्पित कर दिया था. 
यह सूचना भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने लुधियाना के एक सामाजिक कार्यकर्ता के सूचना के अधिकार के तहत मांगे गए सवालों के जवाब में दी. RTI दायर करने वाले रोहित सभरवाल ने बताया कि उन्होंने करीब एक महीने पहले आरटीआई दायर की थी जिसमें PMO से जवाब मांगा गया था. उन्होंने कहा कि मुझे नहीं पता कि उन सवालों को ASI के पास भेज दिया गया, जिसने उनके जवाब दिए हैं.
कोहिनूर का मतलब ‘प्रकाश का पर्वत’ होता है और यह बड़ा, रंगहीन हीरा है जो 14वीं सदी की शुरुआत में दक्षिण भारत में पाया गया था. औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों के पास चले गए इस बेशकीमती हीरे के मालिकाना हक को लेकर विवाद है और भारत सहित कम से कम चार देश इस पर अपना दावा जताते हैं. (फोटो- रॉयटर्स)
एएसआई ने जवाब में बताया कि बेशकीमती पत्थर कोहिनूर को महाराजा रणजीत सिंह ने शाह सुजा उल मुल्क से लिया था जिसे लाहौर के महाराजा ने इंग्लैंड की महारानी को समर्पित कर दिया. जवाब के मुताबिक संधि से लगता है कि दिलीप सिंह की इच्छा पर अंग्रेजों को कोहिनूर नहीं सौंपा गया था, संधि के समय दिलीप सिंह नाबालिग थे. 
सभरवाल ने कहा कि हाल में वह इंग्लैंड गए थे और वहां एक संग्रहालय में मैंने कोहिनूर को देखा और मुझे वहां सूचना दी गई कि यह उपहार में दिया गया था. 
आरटीआई कार्यकर्ता के मुताबिक एएसआई और 2016 में केंद्र के जवाब में परस्पर विरोधाभास है और इसलिए केंद्र सरकार को इस पर गौर करना चाहिए.