भोपाल: मध्य प्रदेश में बीते 15 सालों से बीजेपी सत्ताधारी पार्टी बनी हुई है. कांग्रेस को सत्ता से मिला यह वनवास एक साध्वी की वजह से भोगना पड़ा था. यह साध्वी कोई और नहीं उमा भारती थीं. साध्वी रामजन्मभूमि आंदोलन की फायरब्रांड नेता थीं. उमा भारती ने 2003 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को दो-तिहाई सीटें जिताकर मध्य प्रदेश में सत्ता सौंपी थी. उन्होंने छतरपुर जिले की मल्हरा विधानसभा सीट से जीत दर्ज की थी. उन्होंने कांग्रेस के प्रत्याशी जगदीश शुक्ला को 36 हजार से ज्यादा वोटों से हराया था. सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी बीजेपी ने राज्य में उमा भारती को मुख्यमंत्री बनाया था. इन सबके बीच एक चौंकाने वाली बात ये भी है कि सीएम की कुर्सी पर उमा का कार्यकाल केवल एक साल ही रहा था.  

कर्नाटक के हुबली में तिरंगा फहराने के दौरान भड़की थी हिंसा
उमा भारती को 23 अगस्त, 2004 को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देना पड़ा था. इसके पीछे कारण यह था कि 15 अगस्त, 1994 को कर्नाटक के हुबली में उमा भारती ने तिरंगा झंडा फहराया था. दरअसल, कर्नाटक में हुबली की एक अदालत ने दंगा भड़काने समेत कुल 13 मामले दायर किये गए थे. इसमें से ही एक 10 साल पुराने मामले में उमा भारती के खिलाफ अदालत ने गैर जमानती वारंट जारी किया था. बता दें कि हुबली के जिस ईदगाह मैदान में राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए उमा भारती पर मुकदमा दायर हुआ था. उस मैदान पर हिंदू और मुसलमान दोनों समुदाय के लोग अपना अधिकार जताते थे. 

10 साल बाद एक मामले में जारी हुआ था गैर जमानती वारंट
साल 1994 के स्वतंत्रता दिवस के दौरान मैदान पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने को लेकर ईदगाह प्रबंधन ने रोक लगा दी थी. इस रोक के जवाब में उमा भारती के नेतृत्व में हुबली के ईदगाह मैदान में बीजेपी के हजारों कार्यकर्ता तिरंगा फहराने पहुंच गए थे. इस दौरान वहां फैली हिंसा में कई लोगों की मौत हुई थी. इस घटना के 10 साल बाद एक मामले में अदालत ने उमा के खिलाफ गैरजमानती वारंट जारी कर दिया था. इस मामले में कर्नाटक पुलिस की एक टीम वारंट लेकर भोपाल पहुंची थी. इसके बाद बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व के दबाव में उमा भारती को इस्तीफा देना पड़ा था.

तकनीकी कारणों से जारी रहा था एक मामला
उस दौरान उमा भारती ने न्यायालय में हाजिर होने की घोषणा करते हुए कहा था कि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया है, क्योंकि तिरंगा फहराना राष्ट्रीय स्वाभिमान की बात है. उन्होंने कहा था कि वह इसके लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हैं. इसी के बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था. बता दें कि 2002 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने उमा के खिलाफ लगे सारे मामले वापस लेने का निर्णय लिया था. वहीं, एक मामला कुछ तकनीकी कारणों से जारी रहा था, जिस पर उमा भारती के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी हुआ था. 

उमा भारती का राजनीतिक सफर
गौरतलब है कि उमा भारती का राजनीतिक सफर राजमाता विजयाराजे सिंधिया के सान्निध्य में शुरू हुआ था. उन्होंने पहला लोकसभा चुनाव 1984 में लड़ा, लेकिन वे हार गई थीं. वहीं, 1989 में खजुराहो से उमा ने दोबारा चुनाव लड़ा और जीत हासिल की थी. राम जन्मभूमि आंदोलन में उमा भारती ने एक फायर ब्रांड नेता के तौर भूमिका निभाई थी. 'रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे' उमा भारती ने ही दिया था.