आधिकारिक तौर पर कोई ये मानने के लिए तैयार नहीं है, पर मध्यप्रदेश चुनाव में भारतीय जनता पार्टी जितनी चुनौती सोच रही थी, उसके समक्ष उससे कहीं ज़्यादा है. और इसके लिए कांग्रेस ज़िम्मेदार नहीं है, जितनी खुद भारतीय जनता पार्टी.

या तो ये ज़रूरत से ज़्यादा आत्मविश्वास से पनपा आलस्‍य है या फिर ज़रूरत से ज़्यादा तैयारी में थक गया कार्यकर्ता. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह चुनावी बिगुल बजाते हुए गर्व से कह रहे हैं- भाजपा अंगद का पैर है, जिसे कोई हिला नहीं सकता. पर हकीक़त ये है कि उन्हीं के महाजनसंपर्क अभियान में भीड़ उतनी नहीं जुटी जितनी तैयारी और उम्मीद थी. प्रदेश भाजपा संगठन महामंत्री इस पर रिपोर्ट तलब कर रहे हैं.

समीक्षा नियमित प्रक्रिया है

मध्यप्रदेश भाजपा के पूर्व संगठन महामंत्री कृष्णमुरारी मोघे का कहना है संगठन में कार्यकर्ताओं की उपस्थिति की समीक्षा की गई है तो यह सामान्य प्रक्रिया है. संगठन का काम है पहले तो स्वरूप तैयार करना, उसके बाद वो किस हद तक सफल रहा, इसकी समीक्षा करना और यह किस तरह और प्रभावी ढ़ंग से हो सकता था, इस पर बात करना. शाह का दौरा सफल रहा, हम चुनावी माहौल में इसे और प्रभावी करने के प्रयास में है.


कांग्रेस का दुष्प्रचार है

मुख्यमंत्री जनआशीर्वाद यात्रा के प्रमुख गोविंद मालू का कहना है कार्यकर्ताओं की संख्या कम थी ऐसा प्रचार कांग्रेस कर रही है. इंदौर, उज्जैन, रतलाम, झाबुआ में दौरा पूरी तरह बढ़िया रहा. भाजपा सौ प्रतिशत रिजल्ट पर भरोसा करती है इसलिए कार्यक्रम सफल होने के बाद भी और अधिक सफल बनाने के प्रयत्न में लगी रहती है. समीक्षा करना उसी का एक भाग है.

इंदौर में नसीहत

पार्टी में शीर्ष स्तर पर मंथन का दौर शुरू हो चुका है. जिला स्तर पर समीक्षा बैठकें हो रही हैं. इंदौर नगर अध्यक्ष गोपीकृष्ण नेमा एवं संगठन मंत्री जयपालसिंह चावडा ने तो विधायकों,पदाधिकारियों को नसीहत दे डाली कि वे अपने गिरेबां में झांके. अगर ऐसी ही उदासीनता रही तो हम चुनाव कैसे जीतेंगे.

मैदान से दूर

इन समीक्षा बैठकों में कई कारण सामने आ रहे हैं. ऐसा लग रहा है कि पिछले छह महीने से चुनावी मोड में आ चुका भाजपा कार्यकर्ता चुनाव के पहले ही थक गया है. कुछ हद तक अति आत्मविश्वास ने उसे मैदान से दूर कर दिया है. वहीं एक कारण उसका स्वयं को उपेक्षित मेहसूस करना भी है. पार्टी के उच्च स्तरीय सूत्र बताते हैं इन तमाम कारणों को देखते हुए संगठन अब सक्रिय हो गया है. कार्यकर्ता में किस तरह जान फूंकी जाए इसे लेकर पार्टी संगठन चिंता में है.

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार पिछले 15 साल से सत्ता में काबिज भाजपा के बड़े नेताओं का एक वर्ग ऐसा है जो अतिआत्मविश्वास और दंभ की चपेट में है. कई विधायकों का ज़मीनी कार्यकर्ताओं से संपर्क और तालमेल नहीं है. स्थानीय विधायकों के प्रति नाराज़गी भी भारी पड़ रही है.

कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग यह भी मान रहा है कि 15 साल की सत्ता में उसे कुछ भी हासिल नहीं हुआ है. वो उपेक्षित है. उसकी न तो संगठन में पूछ है न सरकार में. प्रशासन में उसकी नहीं चलती. वो कोई काम नहीं करवा पाता.

दो साल से अभियान पर

संगठन से जुडे एक नेता मानते हैं कि भाजपा ने अंदरूनी तौर पर पिछले दो साल से अपना चुनावी अभियान शुरू कर दिया है. यूपी चुनाव के बाद पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने भोपाल में ज़िला पदाधिकारियों की बैठक ली थी. उसमे संगठन स्तर पर तैयारियों का एक ब्लू प्रिंट दे दिया था. जिसमें संगठन में बदलाव के साथ तकनीकी तौर पर भी संगठन को अपडेट करने के फार्मूले बता दिए थे. प्रत्येक विधानसभा में कितने वाट्सऐप ग्रुप होने चाहिए. यह तक तय हो गया था. बूथ स्तर तक नेटवर्क पर जोर, नियमित बैठकें इसमें शामिल थीं. यह ब्लू प्रिंट ज़मीन पर तैयार हुआ है या नहीं इसे लेकर भी प्रदेश स्तर पर बैठकें हो रही हैं. रिपोर्ट्स मंगवाई जा रही हैं.

संघ की शैली में बैठक

एक और कारण यह भी बताया जा रहा है कि कुछ हद तक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शैली में भाजपा में बैठकें नहीं हो रही हैं. उससे भी कार्यकर्ता ऊब गया है. संघ में इस बात का ‌विशेष ध्यान रखा जाता है. अलग – अलग वर्ग की शाखाएं समय को ध्यान रखते तय की जाती है. युवाओं के लिए शाम की शाखा, व्यापारियों कामकाजी लोगों के लिए रात की शाखा होती है. लेकिन यहां ऐसा नहीं है. दिन में अपने व्यवसाय प्रतिष्ठान कामकाज छोड़ कर कार्यकर्ता नहीं आ पा रहा है.

व्यस्त चुनावी कैलेंडर

पार्टी नेता मानते हैं कि प्रदेश में लगातार चुनावी कार्यक्रम चल रहे हैं. मुख्यमंत्री की जनआशीर्वाद यात्रा, प्रधानमंत्री चुनावी अभियान, पार्टी नेताओं के दौरे और अब अध्यक्ष की सभा. लगातार हो रहे इल इवेंट्स ने भी असर डाला है. ग्रामीण इलाकों में फसल की कटाई का समय हो गया है .इसलिए जो संभागीय सम्मेलन हो रहे हैं उसमे ग्रामीण कार्यकर्ता हिस्सा नहीं ले रहा है. संघ के करीबी एक नेता का तो यहां तक कहना है कि शाह के चुनावी अभियान के बाद एक बात साफ दिखाई दे रही है कि मिडिल क्लास इस चुनाव माहौल से बाहर होता दिखाई दे रहा है.राजनीतिक दलों में भीड़ और उत्साह बढ़ाने का काम यही वर्ग करता है. जीएसटी, नोटबंदी, पेट्रोल, डीजल की बढ़ती कीमतों ने क्या उस पर भी असर डाला है? इसकी भी समीक्षा करने की ज़रूरत है.

युवा वर्ग कहां

पार्टी के एक नेता यह भी मानते हैं कि इस बात की भी समीक्षा करनी होगी की नया युवा वर्ग पार्टी में कहा है? पिछले 15 साल का युवा वर्ग अब  आगे बढ़ गया है. वो अपने जीवन के संघर्ष में जूझ रहा है. सरकार की नीतियां उनकी असफलता भी उसके हिस्से में हैं. जिस पर ध्यान देना होगा.