प्राच्यविद्या  एक दृष्टिकोण

यह सज़ा मास्टर जी क्यों देते हैँ, ये शायद उन्हें खुद भी नहीं मालुम होगा.......

आपको ये जानकर हैरानी होगी कि ये सज़ा भारत में प्राचीन गुरुकुल शिक्षा पद्धति के समय से चली आ रही है. तब यह सिर्फ उन बच्चों की दी जाती थी जो पढ़ाई में कमज़ोर होते थे. पर अब हर किसी बच्चे को किसी भी गलती के लिए दे दी जाती है, क्योंकि उन्हें इसके पीछे छुपा विज्ञान मालूम नहीं है.

हाथ क्रॉस कर, कान पकड़ने की मुद्रा ब्रेन के मेमोरी सेल्स की ओर रक्त संचालन में वृद्धि करती है. साथ ही यह ब्रेन के दाएँ और बाएँ हिस्से में संतुलन स्थापित कर ब्रेन के कार्य को और भी बेहतर बनाती है. यह मुद्रा चंचल प्रवृत्ति को भी शांत करती है.

कान में मौजूद एक्युप्रेशर के बिंदु नर्व्ज़ के कार्य को सुचारू बनाते हैँ, और बुद्धि का विकास करते हैँ. यह मुद्रा ऑटिज्म, एसपर्जर सिंड्रोम, लर्निंग डिसेबिलिटी और बिहेवियर प्रॉब्लम में भी बहुत मदद करती है .

आज हम सब स्मरण शक्ति बढ़ाने वाली इस मुद्रा को भुला चुके हैँ और दूसरी तरह की सज़ा जैसे - हेड डाउन, क्लास के बाहर निकालना एवं अर्थ दंड आदि देने लगे हैँ. पश्चिमी देशों में आज भी इस दंड पद्धति का प्रयोग किया जा रहा है. इसे कई बीमारियों में भी करने का परामर्श दिया जाता है !