सदगुरु स्वामी आनन्द जी
आंतरिक, मानसिक और शैक्षिक उन्नति के लिए श्रेष्ठ पर्व है गणेश चतुर्थी। गणपति बौद्धिक संपदा के स्वामी हैं। इस दिन त्राटक और ध्यान के द्वारा उपासना का विशेष महत्व है। इस दिन को लेकर कई अदभुत,अनोखी और विचित्र मान्यताएं भी सामाजिक ताने बाने की तरह प्रचलन में हैं। महाराष्ट्र में विशेष तौर पर इस दिन लोग अपने घरों में गणपति की प्रतिमा स्थापित कर अपने मित्रों और परिजनों को दर्शन के लिए आमंत्रित करते हैं।
चंद्र दर्शन को लेकर है ऐसी मान्यता
विचित्र बात यह है कि जिसे भी आमंत्रण मिलता है, उसे दर्शन के लिए यथासंभव जाना ही पड़ता है, अन्यथा इसे भावी अनिष्ट या गणपति की कृपा से वंचित होने से जोड़कर देखा जाता है। इस कारण से भी बड़े-बड़े सिलिब्रिटी और राजनेता भी पंडालों में दर्शन के लिए आते हैं।
एक और अजीब प्रथा महाराष्ट्र में इस दिन को लेकर है। कहा जाता है कि गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन शुभ फल प्रदायक नहीं होता है। कहीं-कहीं इसे कलंक कारक यानि मान-सम्मान की हानि करने वाला कहा गया है। हालांकि इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।
इस तरह मिलती है कष्ट से मुक्ति
सदगुरुश्री कहते हैं कि पूर्व के नकारात्मक कर्म जनित दुख, दारिद्रय, अभाव व कष्टों से मुक्ति या इनसे संघर्ष हेतु शक्ति प्राप्त करने के लिए, मंत्र महोदधि, महामंत्र महार्णव सहित तंत्र शास्त्र के कई प्राचीन ग्रंथों के गणेश तंत्र में भाद्रपाद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से चतुर्दशी तक यानि दस दिनों तक गणपति का विग्रह स्थापित करके उस पर ध्यान केंद्रित कर उपासना का विशेष उल्लेख प्राप्त होता है।
सिर्फ इस रंग का मिलता है ग्रंथों में उल्लेख
गणेश तंत्र में प्रतिमा के आकार को लेकर विशिष्ट नियम का स्पष्ट निर्देश प्राप्त होता। मंत्र महोदधि के अनुसार, कुम्हार के चाक की मिट्टी से गणपति की एक ऐसी प्रतिमा का निर्माण यथासंभव स्वयं करें या कराएं, जिसका आकार अंगुष्ठ यानि अंगूठे से लेकर हथेली अर्थात मध्यमा अंगुली से मणिबंध तक के माप का हो। विशेष परिस्थितियों में भी इसका आकार एक हाथ जितना, यानि मध्यमा अंगुली से लेकर कोहनी तक, हो सकता है। इसके रंगों के कई विवरण मिलते हैं, पर कामना पूर्ति के लिए रक्त वर्ण यानि लाल रंग की प्रतिमा का उल्लेख ग्रंथों में मिलता है। गणपति साधना में मिट्टी, धातु, लवण, दही जैसे कई तत्वों की प्रतिमा का उल्लेख मिलता है, पर प्राचीन ग्रंथ चतुर्थी से चतुर्दशी तक की इस उपासना में सिर्फ कुम्हार के चाक की मिट्टी के नियम की ही संस्तुती करते हैं।
इतिहास में मिलता है गणेश पूजन का जिक्र
इतिहास के आगोश में यूं तो भिन्न-भिन्न रूपों में गणेश पूजन के अलग अलग कई अकसर नजर आते हैं, पर आजादी के आंदोलन से बहुत पहले ही महाराष्ट्र में सात वाहन, राष्ट्रकूट, चालुक्य आदि राजाओं ने इस उपासना को उत्सव का स्वरूप दे दिया था। जिसे छत्रपति शिवाजी महाराज और उनके वंशजों तथा पेशवाओं ने आगे बढ़ाया।
इनका भी मिला था सहयोग
साल 1893 में तब के गणित के अध्यापक और बाद के मराठा दर्पण और केसरी अख़बार के संस्थापक बाल गंगाधर तिलक ने इस पर्व को राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान कर इसका उपयोग आजादी के लिए जूझने और छुआछूत जैसी कुरीतियों को दूर करने के वास्ते समाज को संगठित करने के लिए किया। जिसमें उन्हें नेताजी सुभाष चंद्र बोस, बैरिस्टर जयकर, रेंगलर परांजपे, पंडित मदन मोहन मालवीय, मौलिकचंद्र शर्मा, बैरिस्ट चक्रवर्ती,वीर सावकर, दादासाहेब खापर्डे और सरोजनी नायडू का भी सहयोग मिला।