मुहर्रम वह महीना है जिसमें पैगंबर मुहम्मद के नाती हजरत हुसैन शहीद हुए थे। मुस्लिमों के बीच मान्यता है कि वह इस्लाम की रक्षा के लिए शहीद हुए थे। मुस्लिम समुदाय के पाक महीनों में से एक मुहर्रम कल यानी 12 सितंंबर से शुरू हो रहा है। मुहर्रम से इस्‍लाम धर्म के नए साल की शुरुआत मानी जाती है। इसे हिजरी भी कहते हैं और मुहर्रम से ही हिजरी सन् की शुरुआत होती है। इस्‍लाम में 4 महीनों को पवित्र माना जाता है। उनमें से एक मुहर्रम भी है। इसके अलावा मुस्लिम समुदाय में 3 महीने जुल्‍कादाह, जुलहिज्जा और रजब भी पवित्र होते हैं।

मान्‍यता है कि खुद पैगंबर मुहम्‍मद ने इन 4 महीनों को पवित्र घोषित किया था। ऐसा नहीं है कि इन 4 महीनों के अलावा बाकी महीने पवित्र नहीं होते। बल्कि मुस्लिमों के लिए सबसे पाक महीना रमजान होता है। मगर इन 4 महीनों को मुस्लिम समुदाय ज्यादा पवित्र मानते हैं।

कैसे तय की जाती है मुहर्रम की तारीख
इस्‍लामी और ग्रेगोरियन कैलेंडर की तारीखें अलग-अलग होने के कारण मुहर्रम की तारीख हर साल अलग-अलग होती है। इस साल मुर्हरम 12 सितंबर से शुरू होकर 9 अक्‍टूबर तक है। इस्‍लामी कैलेंडर में चंद्रमा को आधार मानकर तारीखें तय की जाती हैं।

मुहर्रम में भी रखे जाते हैं रोजे
ऐसा नहीं है कि रोजे केवल रमजान के महीने में ही रखे जाते हैं। बल्कि मुहर्रम में भी रोजे रखने की परंपरा है। हालांकि मुहर्रम में रोजे रखना प्रत्‍येक मुसलमान के लिए अनिवार्य नहीं होता। ऐसी मान्यता है कि इस महीने में रोजे रखने वालों को काफी सवाब (पुण्य) मिलता है।

क्‍यों मनाया जाता है मुहर्रम?
उन दिनों उमैया वंश के संस्थापक मुआबिया के बटे यजीद ने पिता की मृत्यु के बाद खुद को इस्लामी जगत का खलीफा घोषित कर दिया था। वह एक क्रूर शासक था। उसने हजरत मुहम्मद के नवासे (नाती) हजरत हुसैन को अपनी खिलाफत स्वीकारने का न्योता दिया जिसे हुसैन ने ठुकरा दिया था। उधर कुछ लोग यजीद के खिलाफ थे, उनलोगों ने हुसैन को संदेश भेजा के वे लोग यजीद के खिलाफ हैं और हुसैन को उनलोगों का नेतृत्व करना चाहिए। वे लोग हुसैन को खलीफा मानने को तैयार हैं। उनलोगों की बात मानकर जब हुसैन खलीफा बनने की प्रक्रिया पूरी करने गए तो यजीद की सेना से उनका इराक में संघर्ष हुआ। इराक के कर्बला नाम की जगह पर अपने परिवार और दोस्तों के साथ हुसैन शहीद हो गए। यह घटना मुहर्रम के महीने की ही है। हुसैन मुहर्रम की 10वीं तारीख को शहीद हुए थे। इसी याद में हर साल 10 मुहर्रम को मुस्लिम समुदाय के लोग मातम मनाते हैं।

ये हैं रिवाज 
मुहर्रम को खुशियों का नहीं बल्कि मातम मनाने का त्‍योहार है। इस दिन मुस्लिम हजरत इमाम हुसैन की शहादत को याद करके मातम मनाते हैं। शिया समुदाय के लोग मुहर्रम के 10वें दिन काले कपड़े पहनकर हुसैन और उनके परिवार की शहादत को याद करते हैं। हुसैन की शहादत को याद करते हुए सड़कों पर जुलूस निकाला जाता है और मातम मनाया जाता है। मुहर्रम की नौंवें और 10वें दिन मुसलमान रोजे रखते हैं और मस्जिदों-घरों में इबादत की जाती है। वहीं सुन्‍नी समुदाय के लोग मुहर्रम के महीने में 10 दिन तक रोजे रखते हैं। कहा जाता है कि मुहर्रम के एक रोजे का सवाब 30 रोजों के बराबर मिलता है।