जीवन का अर्थ सिर्फ जन्म लेना और मरना नहीं है। यह क्रम तो हम अतीत में अनगिनत बार निभाते रहे हैं। जीवन वही सार्थक है जिसमें हम मनुष्य बनकर जिएं। मनुष्य देवता बनना चाहता है। मनुष्य का देवता होना कोई बड़ी बात नहीं है। देवता स्वयं चाहते हैं कि वह मनुष्य बनें। प्रश्न है कि फिर मनुष्य क्यों दिग्भ्रमित है? वह क्यों मनुष्य के गुणों को छोड़कर पशुता को जी रहा है?

विकास की अनंत संभावनाएं हर सुबह दस्तक देती हैं, पर हम इस आमंत्रण को क्यों नहीं सुन पाते हैं? हर मनुष्य इसी जन्म में कुछ विशिष्ट उपलब्धियां प्राप्त करना चाहता है, क्योंकि मनुष्य जीवन का मतलब ही है प्रतिक्षण आगे बढ़ना, अस्मिता एवं अस्तित्व की तलाश में प्रयत्न करना। आध्यात्मिकता का विकास केवल मनुष्य जीवन में ही संभव है। समृद्धि आ सकती है, वैभव, भोग-विलास अधिक हो सकते हैं, कुछ चमत्कारिक शक्तियां अधिक हो सकती हैं, पर निरंतर चेतना की गतिशीलता, संवेदना का विकास, अस्तित्व की अनुभूति और प्रत्येक अस्तित्व के प्रति सहानुभूति केवल मनुष्य जन्म में ही संभव है, अन्यत्र नहीं। इसीलिए प्रार्थना के स्वर में कहा जाता है कि मनुष्य बनें और आत्मिक उत्कर्ष के लिए उपलब्ध हों। मनुष्य सही अर्थ में मनुष्य बने, इसके लिए जरूरी है व्यवहार, आचार, संस्कार एवं स्वभाव में परिवर्तन होना।

शेक्सपीयर ने कहा भी है कि दुनिया में सिर्फ दो संपूर्ण व्यक्ति हैं- एक मर चुका है, दूसरा अभी पैदा नहीं हुआ है। प्रसिद्धि व धन उस समुद्री जल के समान है, जिसे जितना ज्यादा हम पीते हैं, उतने ही प्यासे होते जाते हैं। हम जानते हैं कि हम क्या हैं, पर ये नहीं जानते कि हम क्या बन सकते हैं। मनुष्य की सबसे बड़ी दुर्बलता है क्रूरता। क्रूरता के कारण ही आर्थिक कठिनाइयां पैदा हो रही हैं। क्या क्रूरता के बिना कोई आदमी किसी को धोखा दे सकता है? किसी को लूट सकता है? मिलावट कर सकता है? रिश्वत ले सकता है? एक क्रूरता ऐसी प्रभावी हो गई कि सब कुछ खाओ तो भी हजम हो जाता है। सब बुराइयां हजम हो रही हैं। कभी सोचने का अवसर ही नहीं मिलता कि ऐसा नहीं होना चाहिए।

एक व्यवसायी पशुओं को बिना मौत मार सकता है। चारे में ऐसी मिलावट करता है कि चारा खाते ही पशु मरने लग जाते हैं। क्या क्रूरता के बिना ऐसा संभव है? क्या आटे में मिलावट, मसालों में मिलावट, दाल में मिलावट क्रूरता के बिना संभव है? कभी संभव नहीं है। यह सारी आर्थिक भ्रष्टाचार की कहानी, क्रूरता की कहानी है। इसी कारण मनुष्य इंसान नहीं बन पा रहा है। दलाई लामा ने इसीलिए कहा है कि यदि आप दूसरों को खुश देखना चाहते हैं तो करुणा का भाव रखें। यदि आप स्वयं खुश होना चाहते हैं तो भी करुणा का भाव रखें।