एससी एसटी एक्ट पर घिर रही शिवराज सरकार अब डैमेज कंट्रोल में लग गई है. सोमवार देर रात सीएम हाउस में आरएसएस और बीजेपी के टॉप लीडर्स की मीटिंग हुई. इसमें एक्ट के ख़िलाफ जगह -जगह हो रहे विरोध आंदोलन को देखते हुए रणनीतिक प्लान तैयार किया गया है. इसमें सरकार के स्तर पर प्रशासनिक फॉर्मूला लाने की तैयारी की गयी, वहीं संघ और संगठन के स्तर पर भी इससे निपटने की योजना तैयार की गयी.

एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने बताया कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सहित अन्य मंत्रियों और नेताओं के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शन को लेकर पार्टी हाईकमान ने चिंता जताई है. दिल्ली से कुछ प्रशासनिक अधिकारी मुख्यमंत्री से चर्चा कर रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देश के भाजपा शासित मुख्यमंत्रियों की बैठक की थी उसमें भी सवर्णों की नाराज़गी दूर करने  का मामला छाया था. माना जा रहा है कि शिवराज सिंह सवर्णों को साधने के लिए  अब मायावती वाले फॉमूले को मध्यप्रदेश में लागू कर सकते हैं.

उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री बनने के बाद मायावती ने सबसे पहला काम सवर्णों के बीच ‌विश्वास पैदा करने का किया था.  उसमें एससी एसटी एक्ट का राजनीतिक इस्तेमाल करते हुए  बहुत हद तक इसे शिथिल कर दिया था. इसमें तीन प्रावधान ख़ास थे.

1- शिकायत के आधार पर गिरफ्तारी पर रोक लगा दी गई थी.

2- एससी एसटी एक्ट में सिर्फ मर्डर या रेप जैसे जघन्य अपराध ही दर्ज करने के निर्देश थे.

3- एक्ट के तहत शिकायत  फर्जी पाई गई तो आरोपी के खिलाफ धारा 182 के तहत कार्रवाई के आदेश  थे.

4- इस कानून के तहत मामलों की जांच रिपोर्ट समय- समय पर करने के निर्देश थे.

इस फॉर्मूला का असर यह रहा कि  मायावती सवर्णों का भी विश्वास हासिल करने में कामयाब रहीं. अब वहीं तोड़ शिवराज सवर्णों के विरोध को देखते हुए आजमा सकते हैं.

समझने में भूल हुई

पार्टी के नेताओं का मानना है कि सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के संगठन सपाक्स ने जिस तरह से मैदान पकड़ा है उसे समझने में भूल हुई है. आरक्षण का विरोध कर रहे सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के इस संगठन ने पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को शामिल कर इस लड़ाई को बड़ा बना दिया है. इस मुद्दे को अब 65 प्रतिशत  विरुद्ध 35 प्रतिशत  वोटबैंक में तब्दील करने की कोशिश है. अभी तक यह माना जा रहा था कि सपाक्स की आम जनता के बीच कोई पकड़ नहीं है. यह तीन से पांच प्रतिशत सरकारी कर्मचारियों को प्रभावित कर रहा है.

भाजपा को झटका

पार्टी से जुडे सूत्रों का कहना है सपाक्स के आंदोलन ने भाजपा को भारी रणनीतिक झटका दे दिया है.  सवर्णों के वोटबैंक से पूरी तरह आश्वस्त बीजेपी ने पिछले एक साल से आरक्षित वर्ग की 82 सीटों पर अपना फोकस कर दिया था. सिंहस्थ के समय भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का अनुसूचित जाति के संतों  के साथ सिंहस्थ स्नान और भोजन इसी रणनीति का हिस्सा था. भाजपा सवर्णों की पार्टी होने के कांग्रेस के आरोप को तोड़ना चाहती थी.

आरक्षित सीटे तय करती सरकार

मध्यप्रदेश का राजनीतिक गणित बताता है कि आरक्षित 82 सीटें किसी भी दल की सरकार बनाने  में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. 2013 के चुनाव में भाजपा ने 63 सीटें जीतकर कांग्रेस के वोट बैंक को तगड़ा झटका दिया था. पिछले दो दशक से प्रदेश में अपना शहरी वोट बैंक खो चुकी कांग्रेस को इन्हीं वोटों का सहारा था. कांग्रेस अगर कुल सिर्फ 58 सीटों पर सिमट गई तो इसका एक कारण आरक्षित वर्ग की सीटों का नुकसान भी था.

संघ की मुहिम

संघ इस मामले को जनता के बीच ले जाने की तैयारी में है. जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में था और केंद्र सरकार इस पर अध्यादेश लाने की तैयारी में थी तब ही संघ ने इसे लेकर मोर्चा संभाल लिया था. संघ के सामाजिक समरसता अभियान के तहत कुछ विचारकों को देश  के बड़े शहरों में भेजकर आरक्षण के समर्थन में व्याख्यान आयोजित किए गए थे. अब यह मुहिम और भी व्यापक करने की तैयारी है.