प्रस्तुति: अर्चना झा


इस भौतिकतावादी युग में हमारे जीवन की सभी क्रियाएं धन उपार्जन पर केंद्रित हैं। धन प्राप्ति के लिए हम कई बार अपनी आत्मा के स्वर को दबाकर गलत कार्य भी करते हैं, इसलिए धन तो हम अर्जित कर लेते हैं पर मन की शांति कहीं खो जाती है। वैदिक काल में ॠषि-मुनियों को मालूम था कि मनुष्य को धन-धान्य से अंतिम तृप्ति नहीं मिल सकती। धन से संसार के सुख-भोग मिल सकते हैं पर आत्मा को जिस अमृत तत्व की तलाश है, जिसकी प्राप्ति के बाद जीवन का अर्थ समझ आता है, वह धन से सुलभ नहीं है।


यह अमृत तत्व जीवन को रसमय और संपूर्ण करता है और जीवन में इसकी महत्ता धन से अधिक है। बृहदारण्यक उपनिषद् में प्रसंग है कि इस अमृत तत्व की प्राप्ति की इच्छा ॠषि याज्ञवल्क्य की पत्नी मैत्रेयी को हुई। उनकी जिज्ञासा को शांत करते हुए ॠषि याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इस संसार में मन की प्रसन्नता के लिए ही सारी क्रियाएं होती हैं। इसलिए मन के स्वर को सुनो, आत्मा का ध्यान करो और उन्हीं कार्यों को करो, जिनसे मन प्रफुल्लित होता है।


युग बदला पर आज के मशीनी युग में भी याज्ञवल्क्य ॠषि का कथन प्रासंगिक है। मनुज और दनुज के बीच फर्क मन का है, क्योंकि इस मन में ही आत्मा का निवास है और आत्मा परमात्मा का अंश है। दया, करुणा, प्रेम, सहिष्णुता, धैर्य जैसे मानवीय मूल्यों को धारण करके ही व्यक्ति मनुष्य बन पाता है। वर्तमान समय में आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम जीवन मूल्यों से दूर हो गए हैं। जब कभी इन मानवीय गुणों की बात आती है उस समय हम इन भावों को दूसरों के लिए सुरक्षित रखने पर बल देते है। यही कारण है कि जब जीवन में हमारे द्वारा किए गए प्रयास असफल हो जाते हैं, उस क्षण हम अधीर हो जाते हैं। परिणामस्वरूप, हम गलत निर्णय लेते हैं।


जो संवेदनाएं हम दूसरों के लिए रखते हैं, उन्हें अपने प्रति क्यों प्रयोग नहीं करते हैं? आखिर संवेदनाओं की जरूरत तो हमें भी होती है? वास्तविकता यह है कि स्वयं के लिए हमारे मापदंड कठोर होते हैं। इसलिए आपाधापी में अक्सर हम मन के स्वर की अनदेखी कर देते हैं। ऐसा होते ही हमारा अपनी आत्मा, जिसमें ईश्वर का निवास है, उससे संपर्क टूट जाता है। यही कारण है कि संपन्न घरों में भी सुख और शांति का अभाव दिखता है।


पश्चिम में मनोवैज्ञानिकों ने इसे आत्मदया कहा है। जो हृदय अपने प्रति दयालु रहता है, वही दूसरों के प्रति भी करुणा रख सकता है। कठिन क्षणों में अपने प्रति धैर्य का भाव हमारे मन को संबल प्रदान करता है। मन दृढ़ होता है तभी आत्मा का प्रकाश दिखता है। स्वयं के प्रति जब आप धैर्य और करुणा रखते हैं, तब आप एक नई शुरुआत के लिए तत्पर होते हैं।