नई दिल्ली। रेटिंग संस्था इंडिया रेटिंग्स ने चालू वित्त वर्ष के लिए देश का सकल घरेलू विकास (जीडीपी) दर अनुमान घटाकर 7.2 फीसद कर दिया है। संस्था के मुताबिक महंगाई दर में बढ़ोतरी से उपजे जोखिम के मद्देनजर विकास दर अनुमान घटाया गया है। इस वर्ष अब तक की चाल के हिसाब से मानसून के सामान्य रहने की उम्मीदों के बावजूद एजेंसी ने महंगाई दर ऊंची रहने की आशंका जताई है।


एजेंसी ने इसके साथ ही चालू वित्त वर्ष में औसत खुदरा और थोक महंगाई दरों के अनुमान में भी बढ़ोतरी की है। एजेंसी ने इससे पहले चालू वित्त वर्ष के लिए औसत थोक महंगाई दर 3.4 फीसद रखी थी, जिसे बढ़ाकर अब 4.1 फीसद कर दिया गया है। वहीं, औसत खुदरा महंगाई दर का पूर्वानुमान भी 4.3 फीसद से बढ़ाकर 4.6 फीसद रखा गया है।

एक बयान में गुरुवार को एजेंसी ने कहा कि कच्चे तेल के दाम में वैश्विक स्तर पर बढ़ोतरी हो रही है। वहीं, देश में खरीफ फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) फसल लागत का डेढ़ गुना कर दिया गया है। इन्हीं वजहों से जीडीपी विकास दर अनुमान घटाया गया है। एजेंसी ने कहा कि कारोबारी संरक्षणवाद के चलते दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाओं के बीच तनातनी दिख रही है, जिसका खामियाजा भारतीय बाजार को भुगतना पड़ सकता है। इसके अलावा घरेलू बैंकों के फंसे कर्ज (एनपीए) की हालत में निकट भविष्य में सुधार होने के कोई संकेत नहीं हैं।


हालांकि संस्था ने माना कि नोटबंदी ने अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक असर छोड़ा है। पिछले दो वर्षों में मानसून के बेहतर रहने से ग्रामीण खपत में बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा अलावा हाल ही में कई वस्तुओं पर जीएसटी दरें भी कम की गई हैं। इन सभी वजहों से आर्थिक विकास को बल मिला है।

शेयर बाजार पर दबाव, अर्थव्यवस्था पर नहीं


वैश्विक ब्रोकरेज कंपनी यूबीएस ने गुरुवार को कहा कि कच्चे तेल के दाम में उतार-चढ़ाव घरेलू अर्थव्यवस्था को दिशा देने के सबसे प्रमुख कारणों में एक रहने वाला है। कंपनी के मुताबिक घरेलू निवेशकों की तरफ से किया जाने वाला निवेश और आगामी लोकसभा चुनाव अन्य दो सबसे महत्वपूर्ण कारकों में रहेंगे। हालांकि कंपनी ने यह भी कहा कि देश की अर्थव्यवस्था पर वर्ष 2013 जैसा कोई दबाव नहीं है और वह पूरी तरह मजबूत है।

यूबीएस ने सर्वे में निवेशकों से देश की अर्थव्यवस्था पर असर डालने वाले पांच कारकों की पहचान करने को कहा। निवेशकों ने कच्चे तेल की कीमत, घरेलू निवेशकों की तरफ से किया जाने वाला निवेश, आगामी आम चुनाव, फंसे कर्ज (एनपीए) के समाधान और डॉलर के मुकाबले रुपये की चाल को पांच सबसे प्रमुख कारकों में गिनाया।