छत्तीसगढ़ में सरकारी और गैर सरकारी रिकार्डों में दलित शब्द लिखने पर पाबंदी लगा दी गई है. सरकार ने बाकायदा आदेश जारी कर दलित के स्थान पर जाति का उल्लेख करने का निर्देश दिया है.


राज्य में विधानसभा चुनाव के ठीक पहले जारी हुए इस आदेश को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री रमन सिंह की सोशल इंजीनियरिंग का हिस्सा करार दिया. पार्टी का दावा है कि यह सर्कुलर नहीं बल्कि एक शिगूफा है.


सरकार ने जारी किया सर्कुलर


छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले राज्य सरकार ने यह सर्कुलर जारी कर अनुसूचित जाति वर्ग के एक बड़े समुदाय को साधने की कोशिश की है. केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए राज्य सरकार ने सभी सरकारी दस्तावेजों में दलित शब्द के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है.

छत्तीसगढ़ शासन के सामान्य प्रशासन विभाग ने राज्य के सभी सरकारी विभागों को निर्देशित करते हुए कहा है कि यह शब्द संविधान में नहीं है. इसलिए इसका प्रयोग ना हो. राज्य के गठन के पहले संयुक्त मध्यप्रदेश के दौर में तत्कालीन सरकार ने 10 फरवरी 1982 को नोटिफिकेशन जारी कर हरिजन शब्द पर रोक लगाई थी.


इस शब्द के इस्तेमाल पर सजा का भी प्रावधान किया गया, लेकिन दलित शब्द के प्रयोग पर कितनी सजा का प्रावधान होगा यह स्पष्ट नहीं है. बताया जाता है कि मुख्यमंत्री रमन सिंह के निर्देश के बाद सामान्य प्रशासन विभाग ने इस परिपत्र को जारी कर सभी विभागों को दिशा-निर्देश दिए है. इसके उल्लंघन पर सजा के प्रावधान पर विचार किया जा रहा है.


मुख्यमंत्री रमन सिंह के मुताबिक कांग्रेस ने दलितों को जो सम्मान कभी नहीं दिया. वो बीजेपी के सत्ता में आने के बाद उनकी पार्टी दे रही है. उन्होंने कहा कि दलित शब्द से यह समाज आहत है. इसलिए इस पर पाबंदी लगाई गई है. इससे अनुसूचित जाति वर्ग के सम्मान में और वृद्धि होगी.


अनुसूचित जाति की आबादी बढ़ी


छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जाति वर्ग की आबादी वर्ष 2011 के जनगणना के लिहाज से 12 फीसदी थी. अंदाजा लगाया जा रहा है कि 2018 में इसमें 3 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है. राज्य में अनुसूचित जाति वर्ग के लिए कुल 90 में से 10 सीटें आरक्षित हैं. इसमें से 9 सीटों पर बीजेपी काबिज है. जबकि एक सीट पर कांग्रेस का कब्जा है.


लिहाजा, दलित शब्द के इस्तेमाल पर रोक लगाकर राज्य की बीजेपी सरकार ने इस बड़े वर्ग को अपने खेमे में बनाए रखने की हरसंभव कोशिश कर रही है. राज्य की बीजेपी सरकार ने अनुसूचित जाति वर्ग के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं बरसों से जारी है, लेकिन यह वर्ग महसूस करता था कि सरकारी दस्तावेजों में दलित शब्द उनके सम्मान का हनन करता था. इसलिए इस शब्द को निकाल बाहर फेंका जाए.


सीएम रमन सिंह ने अपने तीसरे कार्यकाल के अंतिम दौर में दलित शब्द को बाहर का रास्ता दिखाकर इस वर्ग को बीजेपी के भीतर बनाए रखने के लिए फौरन आदेश जारी कर दिया.


कांग्रेस ने कहा, यह वोटबैंक की राजनीति


उधर, बीजेपी सरकार का यह फैसला कांग्रेस को रास नहीं आ रहा. उसका मानना है कि रमन सिंह की यह शिगूफे वाली एक चाल है, जो वोट बैंक के खातिर चली गई है. पार्टी के मुताबिक विधानसभा  चुनाव के चंद रोज पहले लिए गए इस फैसले का औचित्य सिर्फ वोट बैंक की राजनीति को हवा देना है.

कांग्रेस उपाध्यक्ष रमेश वार्लियनि के मुताबिक बीजेपी ने यह नया शिगूफा छोड़ा है. उन्होंने आरोप लगाया कि 15 सालों में कभी भी बीजेपी को अनुसूचित जाति वर्ग का सम्मान नजर नहीं आया. अभी विधानसभा चुनाव आ गया तो पार्टी इस वर्ग के सम्मान को लेकर चिंतित हो रही है. उन्होंने कहा कि यह रमन सिंह की सोची समझी सोशल इंजीनियरिंग है, लेकिन बीजेपी को इसका फायदा नहीं होने वाला.


छत्तीसगढ़ में इसी साल अक्टूबर-नवंबर माह में होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर बीजेपी और कांग्रेस आमने-सामने है. कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने के साथ-साथ पार्टियां उन जाति, समुदाय और धर्म के लोगों को भी सक्रिय करने में जुट गई हैं, जिन वर्गों का वोट थोक के भाव उनकी झोली में गिरता है.